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नारी जीवन

भोजपुरी पंचायत में छपा मेरा पहला आलेख

नारी जीवन : एक नया आयाम

कभी ध्यान से देखी है आपने वो छोटी सी नदी, जो पहाड़ों का सीना फाड़, वेग से निकलती है। चंचल, असीमित, रोमांच से भरपूर मानो पूरी दुनिया को अपने नन्हें कदमों से नाप लेगी। बिल्कुल एक नादान बालिका सी, हिलौरे मारती, खेलती कूदती, अनवरत बहती, सारे बांध तोड़ती। पेड़ पौधे, चट्टान पत्थर उसे दादा, मामा सा नेह देते। कुछ स्नेह से पुचकारते तो कुछ स्वयं ही बह जाते।

nari शायद स्त्री का जीवन यूं ही शुरू होता है। कहीं न कहीं नदी और नारी की रूह एक ही है, बस स्वरूप जुदा! एक मासूम पहाड़ी नदी सा और ज्यों ज्यों वो जीवन में आगे बढ़ती है, ये बिम्ब और भी गहरा होता चला जाता है।

समय बीतने के साथ, अपनी भोली मुस्कान से मन मोहती, असंख्य पत्थर घोलती, बाड़ों को लांघती वो बालिका रूपी नदी प्रवेश करती है यौवन के प्रांगण में, वही अपनी मासूमियत और उच्छृंखलता लिए, ठीक एक अल्हड़ किशोरी की तरह।

बेहद नाज़ुक समय उसकी जीवन यात्रा का। हर पल इक नया अहसास, नया अनुभव। पल पल बदलती परिस्थितियां, नित नई चुनौतियां। जहाँ एक ओर आज के विकसित समाज में अग्रसर होने के लिए शिक्षा अनिवार्य हो गई है, वहीं दूसरी ओर हमारे पुरूष प्रधान समाज में आज भी बेटियों को वो लाड़, वो प्यार कम ही मिल पाता है, जिस पर बेटे का हक शायद जन्म लेते ही हो जाता है। मां पिता, दादा दादी के प्यार पर भी एक अंकुश ही होता है। पराया धन जो मानी जाती है वो। जन्म लेती पर्वतों की गोद में और जीवन देती पराये मैदान के बाशिंदों को।

सिर्फ सामाजिक तौर पर ही नहीं, नारी के साथ तो प्रकृति ने भी पक्षपात किया है। कई बेड़ियाँ पहनाके भेजा है उसे। उस बालिका सी कुलांचें मारती नदी को भी जल्द ही अहसास होने लगता हैे मैदानों की संकीर्णता का, विस्तृत आकाश के ठीक नीचे फैली विदीर्णता का। ठोकरें लगती हैं उसके स्वाभिमान को, वेग में अवरोध सा आने लगता। थमने सी लगती है वो बेखबर लहरें। धीरे धीरे नदी की ही भांति उस किशोरी की चपलता भी मद्धम पड़ने लगती, ज़िंदगी के थपेड़ों से जूझती। कई निशान पड़ते उसकी देह पर, कुछ खोखले विचारों के, कुछ उच्च आदर्शों का दंभ भरने वाले साहूकारों के। कुछ नये बंधनों, नयी मर्यादाओं से साक्षात्कार होने लगता।

कुछ ही वर्षों में यौवन की दहलीज़ पर कदम रखते ही, नदी की ही तरह छिजने लगता है, नारी का भी दिव्य स्वप्न। जीवन के आकर्षक आंचल में पैबंद लग जाते। बांध बनाने की कोशिशें होने लगती, वेग को सीमाओं में रखने की साज़िशें होने लगती। समाज के ठेकेदार किसी एक को उसका पालनहार बना, बेड़ियां पहनाने की पुरज़ोर कोशिश करने लगते।

जिस प्रेम के नाज़ुक बंधन को जीवनदायिनी अमृत बनना चाहिए, उसे ही सामाजिक, जातीय, वित्तीय समीकरणों के खोखले तराज़ू में तोल एक अनचाहा संबंध बना दिया जाता है।

परंतु ऐसा नहीं कि विवाह हमेशा एक बंधन ही हो। संभावनाएँ तो असीम हैं, नदी और नारी दोनों के लिए। समुद्र में विलीन होना तो नियति है ही दोनों की। परंतु ये मिलन एक खारा समझौता भर हो या मादक, मधुर अहसास, शायद इसी पर सारी बिसात टिकी है।

ईश्वर ने नारी को सृजन की अभूतपूर्व शक्ति दी है। एक नये जीवन को जन्म देना, स्वयं में किसी उपलब्धि से कम नहीं, सबसे बड़ी नियामत है खुदा की। पत्नी और मां बनते ही नारी का पूरा दृष्टिकोण बदल जाता है। खुद से ज़्यादा अपनों के लिए जीने लगती है। भूमिकाएं बदल जाती हैं। घटाओं सी उन्मुक्त लड़की जलाशय सी शांत हो जाती है। प्रेमिका की भांति प्रेम उढ़ेलती, सखी सी सुख दुख में पति का साथ निभाती, ममतामयी मां की तरह घरवालों का ख्याल रखती और चुपचाप भीषण दर्द सहकर सृजन करती। बहती रहती है अनवरत नदी की धारा की तरह। और इन कसौटियों की आंच में सोने सा निखरने लगता है नारी का अस्तित्व भी।

शायद इस विश्व की सर्वोत्तम उपलब्धियों में से एक है, नारी के जीवन का ये अनछुआ, अनभिज्ञ रूप।

परंतु, इस अमृत रूपी कटोरे में गिरी विष की एक बूंद, इस दिव्य स्वप्न को भेदने में सक्षम है। निस्वार्थ भाव से बहन, बेटी, बहू, मां बन अपने कर्तव्य निभाती नारी को यदा कदा ही यथोचित सम्मान मिल पाता है।उसकी भावनाओं को कमज़ोरी समझ लिया जाता है और उसकी कुरबानियों को उसकी नियति!

जिस नारी को हमारे शास्त्र देवी की उपमा देते नहीं अघाते, वहीं हमारा समाज छोटी सी छोटी बात पर छींटाकशी करने में संकोच नहीं करता। नित नए अत्याचार होते हैं उस पर। कभी दहेज की भूख में अंधे हो चुके भेड़िये नुमा ससुराल वालों के द्वारा जला दी जाती तो कभी हवस के पुजारियों की बलि चढ़ा दी जाती। उस पर भी तुर्रा ये कि इन जघन्य अपराधों का ठीकरा भी उसके ही सिर फोड़ा जाता। कभी आधुनिकता को ज़िम्मेदार मानते हुए उसके पहनने ओढ़ने को कोसा जाता तो कभी उसकी गरीबी को हथियार बना उस पर ये समाज हावी हो जाता। यहाँ तक कि आपसी दुश्मनी निकालने का भी सबसे आसान तरीका माता बहनों पर अत्याचार ही माना जाता है।

कुल मिलाकर नारी भी उस नदी की ही भांति है जिस पर ज़बरदस्ती बांध बनाए जाते हैं। लहरों को गलत तरीके से बांधा जाता है। उसमें कूड़ा कचरा बहाकर उसे प्रदूषित करता है हमारा स्वार्थी, भावहीन समाज और जब इनसे मजबूर हो चुकी नदी के सब्र का बांध टूटने लगता है तो उसे विनाश की संज्ञा दी जाने लगती। हालांकि ज़्यादातर प्राकृतिक आपदाओं की तरह ही ये त्रासदी भी मानव निर्मित ही होती है।

इस आलेख का आशय न तो समाज को कोसना है और न ही महिलाओं को अपनी स्वाभाविक सहिष्णुता को छोड़कर आक्रामक हो जाने की प्रेरणा देना। मैं तो प्राकृतिक संतुलन की हितैषी हूँ। न नदी में नाले के पानी बहाने की हिमायती और न ही उसके स्वच्छंद बहाव को मोड़ तोड़ उसे नया रूप देने की हितैषी।

ईश्वर ने ये खूबसूरत दुनिया प्रेम की बिसात पर रची है जिसमें बादलों की ठंडी छांव भी उतनी ही आवश्यक है जितनी सूर्य की तीखी धूप। शायद केवल ज़रूरत तो हर पुर्जे को उसकी सही मान्यता देने की है ताकि मशीन रूपी हमारा ये समाज बिना टुकड़ों में बंटे, प्रगति की तरफ अग्रसर हो सके।

किसी भी समाज की नींव होती है नारी। उसके बिना न सृजन संभव है न पालन पोषण, ठीक वैसे ही जैसे बिन पानी जीवन संभव नहीं। जब तक शरीर के सभी अंगों में तालमेल न हो, उत्कृष्ट जीवन की कल्पना भी असंभव है। ज़्यादा परिश्रम भी नहीं करना, हमें इस समीकरण को सुधारने में। केवल महसूस करना है अपनी जीवनसाथिनी की धड़कनों को, एक संवेदनशील मानव की तरह सम्मान करना है उसकी इच्छाओं का। कड़े समाज के ठेकेदार की तरह नहीं अपितु एक कोमल हृदय पिता की तरह, स्वच्छंद उड़ान देनी है, अपनी बेटी की छोटी छोटी महत्वकांक्षाओं को।

स्त्रियों पर भी ये बातें अक्षरशः लागू होती हैं। अक्सर पुरूष प्रधान समाज से प्रेरित हो वो उसकी रूढ़िवादी परंपराओं को ही जीवन का सच मान बैठती हैं। बहू को कम दहेज लाने और पोता न दे पाने की तोहमत भी वही लगाती हैं। विधवाओं को बेरंग जीवन जीने के लिए मजबूर करना हो या एक स्त्री को बांझ होने का उलाहना देना, बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेने लगती हैं हम, अपने ही स्वरूप को दुख पहुँचा कर समाज की नज़रों में ऊपर उठने के लिए।

हर नदी की तरह नारी को समुद्र रूपी नर में विलीन होना ही है, परंतु ये एक मजबूरी हो,ज़बरदस्ती थोपा गया बंधन हो या एक अनोखा मिलन, ये हम सब की मानसिकता पर ही निर्भर करता है। अंत में यही कहना चाहूँगी कि जीवन के उतार चढ़ाव तो झेलने ही हैं हम सब को, तो क्यों न आपसी समझ और विश्वास से इसकी विलक्षणता को कई गुना बढ़ा दिया जाए।

अंततः जब नदी और समुद्र का मिलन हो तो, नदी का अस्तित्व मिटे नहीं, बल्कि स्वयं समुद्र का ही रूप बन जाए, जो हो कभी माधुर्य से परिपूर्ण तो कभी शिक्षाप्रद अनुभव सा! प्रकृति प्रेमी हूँ मैं, हर पहाड़, नदी, बादल, पत्ते में जीने की सरगम ढूंढती, शायद इसीलिए सबसे मूलभूत प्राकृतिक मिलन को खोखली जंजीरों में बंधा देख पाने में सर्वतः असमर्थ और पूर्णतः बराबरी के संबंधों की पक्षधर।

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