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स्त्री शक्ति, समालोचना, संतोष पटेल

कुछ समय पहले यूट्यूब पर एक कविता पढ़ी थी “स्त्री शक्ति”… संतोष पटेल जी ने इस कविता को न केवल सुना और पढ़ा, बल्कि उसकी विवेचना और समीक्षा करते हुए, कविता ही नहीं, काव्य कर्म से जुड़े कई पहलुओं पर भी बहुत ही सूक्ष्मता से अपने विचार प्रकट किए हैं…

(स्त्री शक्ति मेरे शब्द मेरे साथ पर उपलब्ध है)

प्रस्तुत है स्त्री शक्ति की समालोचना संतोष पटेल जी के शब्दों में…

“टिप्पणी: सद्य कविता की विवेचना करने से पहले कविता के सम्बन्ध में कुछ बातें स्पष्ट हों जाए तो विवेचना की ओर बढ़ना सहज होता है।

कविता कोई अशरीरी या असंस्कारिक विधा नहीं है। संसार के अनुभवों के द्वारा ही कविता की यात्रा सदा हुई है और इस यात्रा में कविता बने रहने की बुनियादी शर्तें क्या हों-यह तय कर पाना कठिन कार्य है और खतरा इस बात का बराबर बना रहता है कि यह कार्य कहीं अंततः हद दर्जे के सरलीकरण में पर्यवसित होकर न रह जाये। कविता के कविता होने की शर्त और उस शर्त की चिंताओं के सरोकार वास्तव में कवि-कर्म और काव्य-विश्लेषण, दोनों ही स्तरों पर सजगता की मांग करता है- जैसा कि सत्य प्रकाश मिश्र, आलोचक परमानंद श्रीवास्तव के पुस्तक ‘समकालीन कविता का व्याकरण’ के लिए लिखते हैं।

अनुपमा सरकार एक ऐसी समकालीन युवा हस्ताक्षर हैं जो किसी खास ‘वाद’ में बंध कर नहीं लिखती। उनकी रचनाओं से गुजरने के बाद उनकी वैविध्यपूर्ण दृष्टिकोण समझ में आ जाता है। वह जिस तरह से लिखती हैं उसमें व्यक्तिवाद नहीं आत्मीयता है, काल्पनिक उड़ान नहीं, आत्मप्रसार है, समाज-भीरुता नहीं प्रकृति प्रेम है, प्रकृति पलायन नहीं वरन नैसर्गिक जीवन की आकांक्षा है, आवेगपूर्ण भावोच्छवास नहीं, संवदेनशीलता है, सौंदर्य की कल्पना नहीं, भावना है, स्वप्न नहीं, अपितु स्वप्न की वास्तविक आकांक्षा है और अज्ञात की जिज्ञासा नहीं, ज्ञान का प्रसार है। कुल मिला कर आप इनकी कविताओं के लक्षणों को विश्लेषित करते हैं तो छायावाद से जोड़ सकते हैं जैसा कि आलोचक नामवर सिंह ‘छायावाद’ (पुस्तक-कविता के नए प्रतिमान) नामक अध्याय में उल्लेखित किया है।

‘स्त्री शक्ति’ कविता फेमिनिज्म की कविता है या नहीं इसपर भी हमें विचार करना है। जैसा कि ‘स्त्रीत्व’ सांस्कृतिक निर्मिति है। इसे एलिस जॉर्डिन और पाल स्मिथ सम्पादित ‘मेन इन फेमिनिज्म’ पुस्तक में बताया गया है कि ‘स्त्री साहित्य’ में तीन पदबन्ध हैं। ये हैं: 1. ‘स्त्रीत्व’, 2.स्त्रीवाद, और 3. स्त्री

‘ स्त्रीत्व’ सांस्कृतिक निर्मित है, स्त्रीवाद राजनीतिक दृष्टि एवं लक्ष्यों की अभिव्यक्ति तो ‘स्त्री’ लिंगाधारित शारीरिक पहचान का प्रतीक है।
(पृष्ठ 8, स्त्री-साहित्य के इतिहास लेखन की समस्याएं, स्त्रीवादी साहित्य विमर्श, लेखक: जगदीश्वर चतुर्वेदी)

उपरोक्त कविता में कवयित्री की भक्ति से शक्ति तक की यात्रा पाठकों का ध्यान उसकी अर्थवत्ता की ओर ले जाती है। कवयित्री भावों को बिंबों में उपस्थित करती है क्योंकि इस कविता में बिम्ब एक विशिष्ट पैटर्न में व्यवस्थित होते हैं इसलिए यह कविता बार बार पढ़ने के लिए हमें बाध्य करती है। इस कविता में प्रयुक्त बिम्ब, प्रभावी मुहावरे, शब्द-विन्यास, लय, टोन ध्वनि आदि संयुक्त रूप से कविता के टेक्श्चर (texture) को रूपायित करते हैं।

अनुपमा सरकार लोकप्रिय स्त्री काव्यधारा की कवयित्रियों से इतर कविता का विषय कृष्ण, राधा अष्टमी, अन्नकूट, रासलीला आदि नहीं बनाती परन्तु लोकोत्सव से संपृक्त नहीं होतीं क्योंकि पूरी कविता में केंद्र दुर्गा को स्त्री शक्ति का मानक माना गया है। अनुपमा इस तरह लोकप्रिय स्त्री काव्यधारा की कवयित्रियों से भिन्न हैं कि उन्होंने अपनी कविता में पुरुष को नायक नहीं वरन स्त्री को नायक बनाया है और शक्ति का केंद्र भी घोषित किया है। इस प्रकार अनुपमा परम्परा को तोड़ते हुए, स्त्री को नायकत्व प्रदान करती है। समकालीन कवयित्रियों की भाषा के अनुरूप वर्जिनिया वुल्फ की शब्दो में …स्त्रियों के लिए वाक्य हमेशा समास बहुल रहा है। पुरुष की भाषा की तुलना में स्त्रियों की भाषा में वाक्य काफी उदार, सहज और स्वाभाविक नजर आता है। सरल वाक्यों में विस्तार की संभावना होती है।

अनुपमा इस कविता में पुरुषों को यथोचित सम्मान देते हुए लिखती हैं कि “पुरूषों को स्नेह मिश्रित अश्रुधारा में डूबे पाया” वस्तुतः यह स्पंदित मानवीयता की अभिव्यंजना को अभिव्यक्त करता है।

कविता में आया ‘बांए पांव के नीचे अर्ध पुरूष’ उपवाक्य समकालीनता में अपनी संस्कृति को रि-डीफ़ाइन करने में लगे भारत के एक बड़के तबके का आज ‘विशिष्ट पुरुष’बन गया है जिसे मूल निवासियों का उत्तम पुरुष बताया गया है, इस तबके को नागवार लग सकता है बहरहाल, प्रबुद्ध वर्ग सहज स्त्रीत्व की भाषा की परखते हुए कविता के मूल उत्स तक पहुँचने की कोशिश करेगा तब यहां विवाद की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती।

अंत में यह कहना समीचीन है कि अनुपमा ने कविता में वृहत्तर स्पेस अर्जित किया है। आप कब काव्यात्मक गद्य लिख देती हैं और काव्य में कब चित्रात्मक शैली दर्ज कर देती हैं यह आपकी काव्यात्मकता के गुण हैं। सुसन सोटेंग के शब्दों को उधार लेकर कहूँ तो- बिंबों की भाषा में दुनिया को पाना यथार्थ के अयथार्थ और सुदूरपन को नये सिरे से पाना है… संतोष पटेल”

(स्त्री शक्ति मेरे शब्द मेरे साथ पर उपलब्ध है)

One Comment

  1. SANTOSH PATEL says:

    अंतर्मन को स्पंदित करने वाली कविता। जितनी सराहना करूँ कम है।

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