Kuch Panne

सितारों की पालकी

सितारों की पालकी

काश किसी रोज़ बादलों की मखमली चादर ओढे़ देर तक सोती रहती। सूरज अपनी चिलमिलाती धूप को बरगद की छांव में छिपा कर, दबे पांव किरणों का इंद्रधनुष अपनी हथेलियों में समेटे, मेरे करीब आता। गुलाब की पंखुडियां नशीली हवा में झूमती, हौले से पांवों में गुदगुदी करतीं। ओस की […]

by December 10, 2017 Fursat ke Pal, Kuch Panne

आवरण

10 बाय 10 के कमरे में दो फुट के रोशनदान से आती रोशनी देखकर गढ़ लेती हूं, गुनगुने ख़्वाब… हाथ बढ़ाकर, खुली आंखों से छू लेती हूं, जगमग आग का गोला… मन की खिन्नता, उंगलियां जला देती है.. पल भर की खुशी, दिल गुदगुदा जाती है… ठन्डे फर्श पर पांव […]

by November 26, 2017 Kuch Panne

सड़न

उत्सव, खुशी, जीवन, उमंग… सकारात्मक ऊर्जा बहती है इनमें… मन भावविभोर हो, डोलता है… तन में स्फूर्ति और सोंदर्य स्वयमेव प्रकट हो जाते हैं… जैसे कोई सोता फूट पड़ा हो… चट्टानों को भेेदता, ऊंचाइयों को रोंदता.. धरातल से मिलन को आतुर प्रेयस सा अधीर… आह! पल पल मधुर गान, सुमन […]

by October 2, 2017 Kuch Panne
अनहोनी

अनहोनी

बहुत कोशिश करती हूं कि नेगटिविटी दूर रख पाऊं… दुख दर्द इतना है संसार में… गर हावी होने दिया तो मुस्कुराहट ढूंढे न मिलेगी किसी चेहरे पर.. टीवी नहीं देखती, अखबार भी नहीं पढ़ती, व्ट्सएप पर आने वाले संदेश फोरवड भी नहीं करती… क्योंकि ज़्यादातर अफवाह और नेगेटिव बातों से […]

by August 13, 2017 Articles, Kuch Panne
सुबह का सूरज

सुबह का सूरज

सुबह का सूरज उम्मीद के पंख लिए आता है… रात की कालिमा को भोर की लालिमा से हरता… पंछियों के गुंजन से सुप्त चेतना को धीमे से जागृत कर.. बदलियों की टुकड़ियों के ठीक पीछे, हौले से मुस्काता.. हल्दी का टीका, माथे पर धर, बांका सूरज… चला है रात रानी […]

by August 10, 2017 Articles, Fursat ke Pal, Kuch Panne
काकभुशुण्डि और कर्म

काकभुशुण्डि और कर्म

कुछ प्रसंग पढ़ते समय जितने गहरे लगते हैं, उस से कहीं ज़्यादा गहरे हुआ करते है.. रामायण महाभारत और पुराण, ऐसे ही कई बहुआयामी प्रसंग खुद में समेटे है… कभी काकभुशुंडी की एक कथा पढ़ी थी.. काकभुशुंडी महाज्ञानी थे, परंतु अहंकार के चलते उन्हें श्राप मिला और वे कौवे की […]

by August 5, 2017 Kuch Panne
स्कूल

स्कूल

आज बरसों बाद सरकारी स्कूल में जाना हुआ… पुराने ब्लैक बोर्ड पर नया वाला पेस्ट कर रखा था… दीवारों पर पलस्तर उखड़े, पंखे ढुलमुल सी चाल चलते.. और खिड़कियों पर धूप और बारिश से बचाव के लिए टूटे शीशों पर मोटी प्लास्टिक शीट चढ़ी हुई… कुल मिलाकर लीपा पोती कर […]

by July 30, 2017 Kuch Panne
जाते जाते

जाते जाते

मन जब बहुत विचलित हो जाता है तो दूर तक देखने का प्रयास करती हूँ… इतनी दूर जहां तारों का जमघट, कंक्रीट के जंगल खत्म हो जाएं.. नज़र आएं तो केवल पेड़ों की फुगनियाँ… बित्ते भर की दूरी पर टहनियाँ टकराकर, मानो एक दूजे को आलिंगन में भरती हों… रूई […]

by July 12, 2017 Articles, Fiction, Kuch Panne