Hindi Poetry

जिज्ञासु

जिज्ञासु

मैं जिज्ञासु हूं। जानना चाहता हूं अपने होने का मतलब। वो एक कारण जिसके लिए मैंने इस धरती पर जन्म लिया। उन लोगों से मिला जो मुझसे अलग थे। उन कामों को किया जो मेरे प्रतिकूल थे जाने अनजाने कितने ही श्रम किए, कितनों से जी चुराया। कितनी ही मृगतृष्णाओं […]

by April 22, 2014 Hindi Poetry
गीली रेत

गीली रेत

गीली रेत के सीने पर लिखती हूं उंगलियों से अपना नाम खो जाता है अगले ही पल सागर की चंचल लहरों में बिना छोड़े कोई निशां। पर नहीं लील पाता समुद्र भी भीगी बालू के निस्वार्थ प्रेम को उस भोले निमंत्रण को क्षणभंगुर मन के बेबाक यंत्रों को। अपनी हठधर्मिता […]

by April 21, 2014 Hindi Poetry
फूलों की लड़ियाँ

फूलों की लड़ियाँ

लाल पीले फूलों की लड़ियां दीवारों पे लटकती पुरानी जर्जर इमारतें भी नए रंगों में चहकती। जिन बेजान पत्थरों में अपनी याद भी बाकी नहीं पुष्पों के संपर्क से सजीव हो चले ज्यों पैदा ही हुए हों महकने के लिए। बसंत क्या आई रूप ही बदल गया दीवारें बोल उठीं […]

by April 20, 2014 Hindi Poetry
परिवर्तन

परिवर्तन

परिवर्तन – प्रकृति का शाश्वत नियम विस्मरणीय, अकथनीय सुख की अनुभूति, असहनीय त्रासदी शीतल मंद पवन सा सुगंधित ज्येष्ठ की ऊष्णता से अद्वेलित। परिवर्तन – स्वयं में एक अपवाद प्रशंसनीय, शोचनीय शशि सा शीतल, रवि सा आग्नेय शिखर सा प्रज्वलित धरती सा आरोहित। परिवर्तन – नियति का अनूठा संगम मेरा […]

by April 20, 2014 Hindi Poetry
ख्याल

ख्याल

ये ख्याल भी कितने शातिर होते हैं न! आंखें मूंदते ही आनन फानन में घेर लेते हैं इंद्रधनुष से सतरंगी घोड़ों पे सवार इठलाते हैं अपने रसीले चटकीले आडंबरों से भरमाते हैं ज्यों मुंह चिढ़ाते हों आ पकड़ पकड़ न हमें छू अपनी कलम से कर दे अमर। जैसे ही […]

by April 19, 2014 Hindi Poetry
बारिश

बारिश

बादल छाए हैं धुएं का आवरण आसमां को पहनाए हल्की हल्की बारिश की बूंदों से लहकती धरती अपनी बरसों की तृष्णा को तृप्त करने की पुरजोर कोशिश करती। एक तरफ असीम आकाश दूसरी तरफ अथाह पृथ्वी। और इन दो दिग्गजों के बीच विस्मित सी खड़ी मैं निरीह बालक सी परिस्थितियों […]

by April 17, 2014 Hindi Poetry

अंजलि

तेरा तुझको अर्पण करके भी मैं परेशान ऐसा तो हो नहीं सकता। शायद मेरे समर्पण में ही कोई कमी है। इसे पूर्ण करने की एक कोशिश और करूँ या छोड़ दूं इसे बीच राह में असमंजस तू ही सुलझा। चल एक बात तो मानी मेरे दुस्वप्न सच होते हैं। स्वप्नों […]

by April 15, 2014 Hindi Poetry
रचना

रचना

निराशा की गलियों में आशा का पता ढूंढती मेरी बेबस मूक चेतना! आंसुओं के सैलाब में खुशियों का तख्त तलाशती मेरी आहत आत्मिक वेदना! अपाहिजों के संसार में स्वस्थ मन सहेजती मेरी निर्बल लाचार प्रेरणा! कमज़ोर बेल सी मज़बूत पेड़ से लिपटती मेरी ये निशस्त्र मूढ़ रचना!

by April 12, 2014 Hindi Poetry