Hindi Poetry

ये मन मौसम

ये मन मौसम

सर्दी में तरसे, सूरज की झलक पाने को गर्मी में करे हाहाकार, धूप से निजात पाने को बरसात में फूंक फूंक रखे कदम कीचड़ से छुटकारा पाने को तो सूखे में पथरे ये आंखें बादल की एक झलक पाने को हाय रे मन बावरा! मौसम सा ही है शायद न […]

by June 15, 2014 Hindi Poetry
शब्दों का मकड़जाल

शब्दों का मकड़जाल

उलझ जाती हूँ इन शब्दों के मकड़जाल में। असीमित वाक्य अनकहेे स्वर विरामों में छुपे नए तथ्य। अब तो इन शब्दों की गर्दन दबोचना चाहती हूँ बांहें मरोड़ना पांव तोड़ना चाहती हूँ अर्क निकाल देना चाहती हूँ भाषा के इन प्रहरियों का शायद कुछ नए अर्थ समझ पाऊँ!

by June 15, 2014 Hindi Poetry
बादल

बादल

देखा यूं ही ध्यान से अभी वो आसमां न चांद दिखा न तारे कि छितरे काले मेघा झूमते पेड़ दिखे, गाती वायु घंटियाँ पल पल जीने को आतुर उन्मुक्त बदलियाँ हवा की सरसराहट भी थी उनमें पत्तों की फड़फड़ाहट भी आ रही है धीमे धीमे जीने की आहट भी!

by June 15, 2014 Hindi Poetry
शनि

शनि

Noticed the planet Saturn in sky tonight and couldn’t stop myself from writing this poem “आज पहली बार हुआ कि चांद देखा पर नज़र इक तारे पे अटक गई चांद में कमी न थी वो तो है ही हसीन पर उस तारे में कुछ बात थी न अपनी चमक को […]

by May 9, 2014 Hindi Poetry
वो आग का गोला

वो आग का गोला

अभी अभी सूरज को भगा के आई हूँ पश्चिम के अंधेरे कोने में दबा के आई हूँ पर है बड़ा ही ज़िद्दी जानती हूँ कल पूरब से फिर आ धमकेगा हंसता मुस्कुराता आग बरसाता कोई बात नहीं हम भी तैयार हैं बादलों का झुंड लिए!

by May 1, 2014 Hindi Poetry
शब्द : अर्थ

शब्द : अर्थ

आशंकाएं अपेक्षाएं अभिलाषाएं जितने कठिन शब्द उतने ही गहरे मतलब पग भरते ही मंज़िल के दूर होने का डर मंज़िल मिल गई तो देर होने का डर ऊंचाई पर पहुंच फिसल जाने का डर यही तो है न आशंका? कर्म करते ही फल मिलने की आशा बीज बोते ही पेड़ […]

by April 22, 2014 Hindi Poetry
जिज्ञासु

जिज्ञासु

मैं जिज्ञासु हूं। जानना चाहता हूं अपने होने का मतलब। वो एक कारण जिसके लिए मैंने इस धरती पर जन्म लिया। उन लोगों से मिला जो मुझसे अलग थे। उन कामों को किया जो मेरे प्रतिकूल थे जाने अनजाने कितने ही श्रम किए, कितनों से जी चुराया। कितनी ही मृगतृष्णाओं […]

by April 22, 2014 Hindi Poetry
गीली रेत

गीली रेत

गीली रेत के सीने पर लिखती हूं उंगलियों से अपना नाम खो जाता है अगले ही पल सागर की चंचल लहरों में बिना छोड़े कोई निशां। पर नहीं लील पाता समुद्र भी भीगी बालू के निस्वार्थ प्रेम को उस भोले निमंत्रण को क्षणभंगुर मन के बेबाक यंत्रों को। अपनी हठधर्मिता […]

by April 21, 2014 Hindi Poetry