Hindi Poetry

जिजीविषा

अहसासों के दरिया पर शब्दों का पुल बांधती हूँ हंसी, प्यार, दर्द, तड़प, व्यंजनों में परोसती हूँ जोड़ती हूँ विविध आयाम, ज्यामिति के कोणों सी दुरूह जीवन-शैली को निर्जीव भाषा शिल्प में ढालने का असफल प्रयास करती हूँ विचारों के रेले को दूर धकेल मनचाहा गन्तव्य सुनिश्चित करती हूँ जबकि […]

by February 24, 2016 Hindi Poetry
एक प्याली चाय

एक प्याली चाय

उबासी लेता चाँद बदलियों से गप्पें लड़ा रहा था पूस की रात लम्बी थी और सूरज की तबीयत कुछ बहकी सी आज सितारों की महफ़िल देर तक चलने वाली थी जवां सर्द हवाएं कानाफूसी कर रहीं थीं निशाने पर थी अलाव सेंकते उस जोड़े के कंपकंपाते हाथों में दिलकश अदाएं […]

by January 24, 2016 Hindi Poetry
पाती

पाती

सुबह के सात बजते-बजते ये गुलाबी फूल खिलने लगते हैं सूरज पीपल के कांधे से ऊपर उठ आता है दूर कहीं रेल का ऊंचा सा साईरन सुनाई देता है कोयल मैना धनेष भी अपनी भाषा में कुछ कहने से लगते हैं गिलहरियां दौड़ती टहनियां डोलती सी लगती हैं पार्क का […]

by January 19, 2016 Hindi Poetry
मेरी ज़िन्दगी

मेरी ज़िन्दगी

हौले से दस्तक दी उसने अलसाई आँखों ने उस पार झाँका इक जाना पहचाना सा चेहरा था चौढ़ा माथा, भरे होंठ, उन्नत नासिका आकर्षक पर विस्मयकारी उसकी आँखों में कई सवाल तैर रहे थे पुतलियाँ मध्य में सटी हुईं भृकुटियां चढ़ी हुईं मानो अतीत वर्तमान भविष्य तीनों काल एक साथ […]

by January 17, 2016 Hindi Poetry

केवल तुम

श्याम मेघ के शीर्षपटल पर स्वर्ण रेख-से उज्ज्वल हो आंदोलित सागर के तट पर श्वेत मौक्तिक-से निर्मल हो कठोर धरा के उर्वर पट पर नव अंकुर-से कोमल हो मानस-कल से हृदय-तल तक केवल तुम ही अंकित हो केवल तुम ही अंकित हो ! Anupama

by November 27, 2015 Hindi Poetry
एक स्वावलम्बी स्त्री

एक स्वावलम्बी स्त्री

आत्मनिर्भर हूँ मैं, एक स्वावलम्बी स्त्री पुरुषों के समाज में कांधे से कांधा मिलाती स्वाधीन भारत के निर्माण में कहीं कोई छोटा सा योगदान दे खुद को जागरूक नागरिक सामाजिक प्राणी, एक सम्मानित इकाई सिद्ध करने का भरसक प्रयास करती हाई हील पहनकर सीमेंट के फर्शों पर खटर पटर चलते […]

by November 27, 2015 Hindi Poetry, Recital

क्षणिक 1

बन्द आँखों से ईश्वर ढूंढती रही उम्र भर नज़रें मिलीं और वो दिख गया वक़्त की पाबन्द हो चली हूँ तुझसे दूर बीते हर लम्हे का हिसाब रखती हूँ 108 मनकों की माला फेर, दुनिया जोगी कहलाये अनगिन साँसों में जप, उसका नाम, ‘वो’ बावरी हुई जाये जागते हुए ख़्वाब […]

by November 24, 2015 Hindi Poetry
महानगरीय कोने

महानगरीय कोने

ईंट गारे से बने मकान भाते हैं मुझे नन्ही इकाईयां एक हो जाएँ तो कितनी मज़बूत है ज़िन्दगी हौले से बताते हैं मुझे पर आज की सुबह कुछ अलग है मार्बल कटने की तीखी आवाज़ कानों में पिघला शीशा घोल रही है ड्रिलिंग मशीन कर्कश स्वर में जाने कौन से […]

by November 24, 2015 Hindi Poetry