Review

Pagla Ghoda Movie

पगला घोड़ा: अजीब सा नाम, सोचती रही देखूं या नहीं..

फिर नाम पढ़ा बादल सरकार का, जिनके लिखे नाटक पर ये फिल्म बनी है.. जिज्ञासा हुई कि आखिर है क्या..

एक लड़की की लाश, चार अनजान आदमी, श्मशान का सीन और एक के बाद एक उघड़ती परतें..

प्रेम, जो परवान नहीं चढ़ता, कभी समाज की वजह से तो कभी व्यक्तिगत कारण या परिस्थितयों के चलते… पर एक टीस सा चुभता रहता है, सालों साल.. अनजान लोगों का साथ पाकर, वो दबा छुपा दर्द उभर आता है.. चारों आदमी, शराब के नशे में खुद को भूलने की कोशिश करते हुए, अपनी ज़िंदगी के राज़, एक दूजे से बांटने लगते हैं.. उनमें से एक हंसते हुए कहता है कि “प्यार की त्रासदी क्या, वही बंगाली लड़के की कहानी, जिस से प्रेम करो, उसका किसी और से शादी हो जाना” चारों फीकी मुस्कान से इस बात को एक्सेप्ट कर लेते हैं

पर वे नहीं जानते कि उनके बीच, उस लड़की की आत्मा भी मौजूद है, जिसकी लाश फूंकने, वे इकट्ठा हुए हैं.. चित्रांगदा, को वे नहीं सुन पाते,पर कथानक को दिलचस्प मोड़ देते हुए, वह आत्मा किरदारों से संवाद करती है.. और ऊपर के डायलॉग के जवाब में तपाक से कहती है “और बंगाली लड़कियां? क्या वे प्रेम नहीं करतीं? क्या उनकी कोई कहानी नहीं होती?”

इतना भर सुनते ही जाने अनजाने मुझे शरत चन्द्र की “पारो” याद आ गई.. क्या देवदास के साथ ही हुई थी त्रासदी, जिसे वह शराब के नशे में डुबोता रहा.. या फिर पारो थी असल विक्टिम, जिसे प्रेमी नकार देता है, बूढ़े के पल्ले बांध, तीन बच्चों की अम्मा बना दिया जाता है.. और अंत समय, देवदास उसी के दरवाज़े पर दम तोड़ जाता है, उमर भर का गिल्ट उसे सौगात में देते हुए.. क्यूं नहीं लिखी जाती ऐसी उपेक्षित प्रेमिकाओं की कहानी? प्रेम एकतरफा एहसास तो नहीं.. रिश्ता टूटे तो दो लोग घायल होते हैं.. फिर दूसरा पक्ष, हमारी मूवीज, नोवेल्स और कहानियों में कहीं कम मुखर क्यों?

और इसीलिए पगला घोड़ा मुझे कहीं अंदर तक छू गई. बेहद सशक्त लगा मुझे ये सीन.. और पूरी मूवी का इस बात पर बल देना कि कैसे एक आदमी, अपनी प्रेमिका को भुलाने की कोशिश में उसके अस्तित्व को नकारता रहता है.. पर अचानक एक दिन, वो नासूर फूटता है और, बाहर निकल आती है नारी को दी गई चोट की संवेदना…औरत के आंसू, आदमी का सुकूं, और दर्द की दास्तां..

बहरहाल जैसा टाइटल, वैसी ही फिल्म, एकदम हटकर.. आखिर तक देखने का मोह छोड़ न पाई, जानते हुए कि इस कहानी का कोई अंत नहीं… कुछ किस्से छू जाते हैं…

चित्रांगदा चक्रवर्ती, की उपस्थिति, मूवी की सबसे बड़ी सफलता है… चिता पर जलती, और हर किरदार और उनकी कहानियों से जुड़ी… फिल्मांकन भी एकदम अलग, सस्पेंस बरकरार और निर्देशन कसा हुआ… आजकल के सिनेमा में एक अलग एक्सपेरिमेंट.. बिकास रंजन मिश्रा की सफल प्रस्तुति..

Movie: Pagla Ghoda
Directed by: Bikas Ranjan Mishra
Based on: Pagla Ghoda play by Badal Sarkar
Cast: Chitrangada Chakraborty
Anshuman Jha
Vikram Kochhar
Ravi Khanvilkar
Gopal K. Singh

2 Comments

  1. Rameshwer Singh says:

    Excellent write

  2. Anupama Sarkar says:

    Thanks a lot Rameshwer ji 🙂 Glad you enjoyed reading it.

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