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Tricolor

Tricolor

Orangy Carrots White Khoya Lots of Pistas Gajar ka Halwa allured me With its Tricolor appeal. Greedily I devoured half of it Forgetting all about Equality Between mouthfuls I looked around sheepishly Should I share it with others Think about everyone’s part And distribute it magnanimously. But on second thoughts […]

by January 26, 2017 Poetry
भारतीय

भारतीय

रजाई में बैठी मैं अपने पाँव ठंडे होने से परेशान हो रही थी। दिल्ली में आखिर सर्दी ने ज़ोर पकड़ ही लिया, इस बात की ख़ुशी और शिकायत दोनों ही मैं अमूमन कुछ ज़्यादा करती हूँ। आखिर मौसम का बदलाव इस कवि मन को भाता जो है और व्यायाम से […]

by January 26, 2017 Fursat ke Pal
चौराहे के कबूतर

चौराहे के कबूतर

आज मेरी बस चौराहे के बिल्कुल पास खड़ी थी समीप ही कबूतरों की पूरी टुकड़ी बिखरे दाने समेटने में जुटी थी स्लेटी काया नीला कंठ बटन सी आंखें गहरे गुलाबी छितराए से नन्हें नन्हें पांव गर्दन मटकाते पंख फुलाते ढुलमुल सी चाल चलते भोले से कबूतर बड़े प्यारे लग रहे […]

by January 23, 2017 Hindi Poetry
दीवा

दीवा

“बापू सोड़े में चांदना दीखे है…. दीवे ने फूंक मार दे… दीखना बंद हो जाऊगा” हंसते हुए अपनी भाषा में एक जोक सुनाया उन्होंने, हरयाणवी की खड़ी बोली का स्वाद लेने के बाद मैंने हिंदी रूपांतरण पूछा… वो कहने लगे एक लड़के की रजाई पुरानी हो गयी थी, उसने पिता […]

by January 21, 2017 Kuch Panne
Healing Yourself through Chakras

Healing Yourself through Chakras

Life has an uncanny habit of hitting you, when you least expect it to. I firmly believe that life is nothing but a walk through tough terrains of crazy mountains and ravenous rivers, where peaks are bound to be followed by deep valleys and each ebb would bring a fresh […]

by January 19, 2017 Articles
वास्तविक

वास्तविक

किसी ने कहा ये क्या हर पल फूल पौधों पेड़ों पक्षियों पर लिखती हो कुछ वास्तविक लिखो सड़कों के गढ्ढों पर बढ़ते करप्शन पर विफल हो चुके प्रशासन पर गरीबों के उत्थान पर। हमने भी जुगत भिड़ाई सोचा चलो इनसे भी दो दो हाथ कर लें भाई! विचारने लगे हम […]

by January 18, 2017 Hindi Poetry
बला

बला

“बला” भागते शहर का व्यस्त चौराहा और उसके बीचोंबीच बनी सीमेंट की तिकोनी पट्टी, कबूतरों का जमघट-सा लगा रहता दिनभर। पंछियों को चारा देने से आई बला टल जो जाती है। पर सांझ ढलते ही नज़ारा बदल जाता। मुन्नू चुपचाप झाड़ू ले, बिखरे दानों को समेट लाता। बला की कौन […]

by January 18, 2017 Nano fiction
अक्षर

अक्षर

अक्षर अक्षर बुनते शब्द शब्द चुनते लबों पे मुस्कान लिए मुलायम सपने गुनते अक्सर छप जाते हैं उँगलियों के निशां उन कोरे पन्नों पे छूती हूँ उन्हें प्यार से कलेजे से लगा लेती हूँ बिन कहे बिन लिखे बस इक फ़साना यूँ ही गुनगुना लेती हूँ Anupama

by January 17, 2017 Hindi Poetry