Hindi Poetry

नींव बहुत गहरी थी

नींव बहुत गहरी थी
बरसों के आंसुओं से
धीरे धीरे भरी थी
दीवारें बहुत ऊंची थीं
सदियों के रिवाज़ों से
धीमे धीमे उभरी थीं
खिड़कियां जंग खाईं थीं
बाहर की तरफ
अब नहीं खुलती थीं
न आने का ज़रिया
न जाने का रास्ता
बस साँसें लेता था वो
बेड़ियों में नहीं
बुलबुलों में जकड़ा था
शायद अपनी क़ैद का
उसे पता भी न था
पर जाने कैसे हवा का
इक मतवाला झोंका
खिलखिलाता गुनगुनाता
दरारों को अपनी दास्तां सुनाता
हौले से उस को छू गया
सूख गए आंसू सारे
रीतियाँ चरमरायीं
बरसों पुरानी चाहत ने
फिर पंख फड़फड़ाये
और मन आज़ाद हुआ
बस चिटखनी ही तो खोलनी थी !!

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