Hindi Poetry

मेरी ज़िन्दगी

हौले से दस्तक दी उसने
अलसाई आँखों ने उस पार झाँका
इक जाना पहचाना सा चेहरा था
चौढ़ा माथा, भरे होंठ, उन्नत नासिका
आकर्षक पर विस्मयकारी
उसकी आँखों में कई सवाल तैर रहे थे
पुतलियाँ मध्य में सटी हुईं
भृकुटियां चढ़ी हुईं
मानो अतीत वर्तमान भविष्य
तीनों काल एक साथ एक ही जगह
महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा कर रहे हों
अजीब सा सुकूँ और इक अजब सी बेचैनी
एक साथ उसके चेहरे पर आ जा रहे थे
मैं उसे एकटक देख रही थी या यूँ कहूँ कि
कहीं बहुत गहरे उतर चुकी थी
पर क्या ढूंढना चाह रही थी उनमें
ये बात समझ से परे थी
आँखों ने आँखों से नज़रें हटाईं और
अनायास ही उसके होंठों पर जा अटकीं
बुदबुदा रही थी वो, मन्त्र, गाली या प्रश्न
जानना सम्भव नहीं था
शब्दों के तानेबाने में अहसासों की कमी
साफ़ झलक रही थी
और भाषा तो ठहरी ही गुलाम
चन्द अक्षरों, लिपियों, उच्चारण की
जब तक भावों की आत्मा प्रवेश न पाये
उसका अपना अस्तित्व ही क्या
मनोभाव समझने भी आसान नहीं थे
होंठ एक तरफ से नीचे और
दूसरी तरफ से ऊपर उठे थे
जाने मन्द मुस्कान थी या
एक टेढ़ी सी खीज जो उसके सौंदर्य को
आश्चर्यजनक ढंग से बढ़ा और घटा रही थी
उसने अपनी कोमल बाहों से अपने ही तन को
जकड़ रखा था, सर्दी की कंपकंपी और
मन के जाड़े ने एक साथ उस पर
हमला सा बोल रखा था
तलवों में छाले पड़े थे, और उंगलियों में छल्ले
कभी एक तो कभी दुसरे पाँव पर
अपने तिनके से शरीर का बोझ नियंत्रित करती
वो स्त्री मुझे आंदोलित कर चुकी थी
मानव मन की फितरत ही ठहरी
जो समझ न पाओ, उस से डर जाओ या पूजने लगो
दोनों ही विकल्प मेरे दिल ओ दिमाग की
तराजू में बराबर वज़न रखे झूल रहे थे
अचानक उसने हाथ बढ़ाया और
चुटकी बजाकर बोली, कहाँ खो गयी सखी
आत्मीय सम्बोधन सुन मैं थोड़ा सकपकाई
उसके होंठों की उदास मुस्कान थोड़ा और उभर आई
और हौले से मेरा हाथ पकड़ उसने कहा
भूल गयी, मैं हूँ तेरी ज़िंदगी
तेरी हर गलती मुझे प्रताड़ित करती है और
तेरी हर सफलता मुझे प्रफुल्लित
तेरी हंसी खनकती है तो मेरी धड़कनें गा उठती हैं
तेरे आंसू बहते हैं तो मेरी शिराओं में कम्पन हो उठता है
तेरे हर कदम पर सबसे पहले मैं ही बिछती हूँ
और तेरे हर फैसले के ज़ख्म अपने मन पर लिए फिरती हूँ
तेरी अक्स हूँ, तेरा प्रतिबिम्ब, मेरा अपना वजूद ही कहाँ
मैं हैरां थी, खुद को दिए ज़ख्मों पर मलहम लगाऊं या
अब तक ज़िंदा रहने का जश्न मनाऊँ
आँखों ने एक बार फिर उन आँखों में झाँका
और सम विषम, सुख दुःख, प्रेम घृणा का
अस्तव्यस्त रूप मैंने ठीक अपने सामने खड़े पाया
बेतरतीब लटों में उलझे सुथरे चेहरे सी व्याकुल
मेरी ज़िन्दगी – उतार चढ़ाव की सीढ़ी जो
ऊपर नीचे जाने का माध्यम है केवल, गन्तव्य नहीं ।

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