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मित्रो मरजानी, कृष्णा सोबती

मित्रो मरजानी: एकदम अलग सा नाम.. ऐसा कुछ किंडल पर झलके, तो अनदेखा कर आगे बढ़ पाना मुश्किल हो जाता है.. तिस पर कृष्णा सोबती जी लेखिका हों तो जिज्ञासा और बढ़ जाती है.. सो झट डाउनलोड की मित्रो मरजानी और पढ़ने बैठ गई…

किताब ज़्यादा लंबी नहीं है, दो ही सिटिंग में पूरी पढ़ डाली या यूं कहूं गटक ली.. कहानी है भी कुछ ऐसी कि ब्रेक लेते नहीं बनता.. मोटे अक्षरों में कहा जाए तो एक आम सीधे सादे परिवार के भीतर, इस तरह की कहानी बुनी जा सकती है, सोचा न था..

वैसे भी हम इंसानों की सोच समझ दरअसल अपने खट्टे मीठे अनुभवों की मिट्टी पर ही उपजती है.. अगर आपका वास्ता मुंह के मीठे और दिल के काले लोगों से न पड़ा हो तो दुनिया बड़ी ही खूबसूरत दिखती है.. आप चांद के दाग, देख ही तब पाते हैं, जब उसकी सुंदरता से नज़र हटे.. वरना तो बस उसकी तारीफ में शेर और गज़ल ही कहे जाओ..

कुछ ऐसा ही हाल है धनवंती का.. ढलती उम्र में अपने जीवनसाथी की गिरती तबियत की चिंता में डूबी वंती, दरअसल तीन तीन जवान बेटे बहुओं की दमदार सास है.. या कम से कम ऐसा सोचती भर है.. आढत के काम में डूबे उसके दो बेटे बनवारी और सरदारी, एक सी रौबीली कद काठी के बावजूद, व्यवहार और व्यक्तित्व में एकदम जुदा हैं..

बड़ा बनवारी, अपनी सुशील पत्नी “सुहागवंती” के साथ चैन की बन्सी बजा रहा है तो मंझला बेटा सरदारी अपनी मुंहफट पत्नी “सुमित्रावंती” के साथ रोज़ जूतम पैजारी पर उतारू.. और इन दोनों से बिल्कुल उलट तीसरा, सबसे छोटा बेटा, गुलज़ारी, जो अपनी फूलवंती की हां में हां, बिना कुछ सोचे समझे मिला देता है..

कहना न होगा कि इन चार “वंतियों” की कहानी को एक साथ पिरोती सोबती जी ने, कम से कम किरदारों को लेकर, एक अच्छा खासा बैकग्राउंड तैयार किया है.. और इस मध्यम वर्गीय ठेठ पंजाबी परिवार की अंदर की कहानी, तेज़ी से दिशा बदलती है..

और इस जमावड़े में, सबसे ज़्यादा प्रभावित करता है मित्रो यानी कि मंझली बहू “सुमित्रा वंती” का किरदार.. वो अपनी दैहिक इच्छाओं को लेकर जितनी मुखर है, उसकी कल्पना भी शायद इस परिवार की बाकी सदस्यों ने कभी नहीं की होगी.. वह बार बार यह इंगित करती है कि उसका पति उसे संतुष्ट नहीं कर पाता या करना नहीं चाहता.. पर हर बार ससुराल वाले उसी के चरित्र पर सवाल उठाकर, सरदारी की कमी वाली बात को पीछे धकेल देते हैं..

अक्सर सरदारी मित्रो को बुरी तरह पीटता है, और सास ससुर जेठ जेठानी बीच बचाव कर, उसे बचाते हैं.. पुचकारते हैं.. पूरी किताब में ये कड़ी खुलने में काफी वक़्त लगता है कि आखिर समाज के द्वारा मित्रो के चरित्र को निशाने पर क्यों रखा जा रहा है.. जबकि ससुराल वाले, कम से कम सास ससुर उसे काफी सपोर्ट करते नज़र आते हैं..

वहीं दूसरी ओर है, सबसे छोटी बहू फूलां, जो किसी भी तरह अपने ससुराल वालों के ऊपर दहेज उत्पीड़न का इल्ज़ाम लगा, अपने मिट्टी के माधो, गुलज़ारी को लेकर अलग हो जाना चाहती है.. कई मोड़ आते हैं कहानी में और हर बार किरदारों का एक नया रूप सामने आता है.. हालांकि कुछ भी खुलकर नहीं कहा जाता, पर ये बात साफ साफ उभरती है कि इंसान अपनी परवरिश को साथ लेकर आगे ज़रूर बढ़ता है, पर उसकी अपनी प्रकृति ही अंततः उसे अच्छा या बुरा इंसान साबित करती है…

मित्रो मुंह की लाख बुरी सही, पर मन में उतनी कालिख नहीं रखती जितनी कि भले घर की फूला.. न ही इतने बैर के बीज बोती है और क्लाइमैक्स तक आते आते, अपनी किस्मत पर इतरा कर, अपने सरदारी से समझौता भी कर लेती है..

हालांकि मित्रो का किरदार गढ़ा ही इसलिए गया है कि एक उत्श्रृंखल नारी का चित्रण किया जा सके, पर कृष्णा सोबती, कहीं न कहीं नम पड़ जाती हैं.. और मित्रो देह की भूखी नहीं बल्कि प्यार चाहने वाली महत्वाकांक्षी और साहसी महिला के रूप में ज़्यादा फिट बैठने लगती है.. वहीं उसकी सास धनवंती को धर्म कर्म और संस्कारों में इतनी अगाढ़ आस्था है कि लाख बार, मित्रो के कारनामों (?) की दास्तां सुनकर, भी वह उस पर पूरा विश्वास सहेजे रहती है..

उपन्यास या कहूं दीर्घ कहानी, काफी कम शब्दों में अपनी बात कहती है, हालांकि अगर थोड़ा और विस्तार दिया जाता तो भी कोई बुराई नहीं थी.. बल्कि पाठक का जुड़ाव गहरा ही होता.. संक्षेप में कहने की वजह से कुछ बातें क्लियर नहीं लगीं.. मसलन सुहाग अगर बनवारी की नई बहू है तो क्या वो उसकी दूसरी पत्नी है या फिर केवल मित्रो और फूला की शादी पहले हुई, इसलिए उसे ऐसा कहा जाता है.. क्या सरदारी और गुलज़ारी इंपोटेंट हैं या फिर अपनी बीवियों से दबे हुए पुरुष, जिन्हें स्त्री चरित्र की खास समझ नहीं है.. मित्रो के ऊपर इल्ज़ाम बहुत लगाए जाते हैं और उसके ख्यालों ख्वाबों में भी दूसरे पुरुषों का ज़िक्र दिखता है, पर उसके कभी ऐसे सम्बन्ध बने, ये साफ नहीं..सो काफी हद तक ये कहानी एक मूवी की तरह चलती है, जहां आपको किरदारों के हावभाव से ही मज़मून समझने की कवायद करनी पड़ती है..

एक बात और, कहानी में काफी ज़्यादा पंजाबी शब्दों का प्रयोग किया गया है.. पूरी किताब पंजाबियत से सराबोर है, देसी फ्लेवर भाता भी है.. पर गैर पंजाबी पाठकों के लिए इसे समझना कतई आसान नहीं..

खैर, कृष्णा सोबती जी का ये उपन्यास, खासा लोकप्रिय है और 1967 में वुमन सेक्सुअलिटी पर इतना खुलकर लिखना, वाक़ई एक उपलब्धि है.. बहुत ज़्यादा इंप्रेस्ड नहीं हूं, पर अभी उनका लिखा और बहुत कुछ पढ़ना है.. इसे तो बस एक लंबी यात्रा की शुरुआत भर समझ रही हूं..
Anupama Sarkar

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