Hindi Poetry

एक स्वावलम्बी स्त्री

आत्मनिर्भर हूँ मैं, एक स्वावलम्बी स्त्री

पुरुषों के समाज में कांधे से कांधा मिलाती
स्वाधीन भारत के निर्माण में
कहीं कोई छोटा सा योगदान दे
खुद को जागरूक नागरिक
सामाजिक प्राणी, एक सम्मानित इकाई
सिद्ध करने का भरसक प्रयास करती

हाई हील पहनकर सीमेंट के फर्शों पर
खटर पटर चलते
टेढ़े रास्तों में
सीधी राह खोजने की
असफल सी कोशिश करती

निगाहें रहती हैं लक्ष्य पर
भृकुटियां तनी हुई
चेहरे पर लेश मात्र भी
थकान प्रदर्शित करने से बचती हूँ
कहीं कमज़ोर न समझ ली जाऊं

एक आवरण सा ओढ़े
दिन भर ज़िंदगी की ऊहापोह में
बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेती हूँ
राजनीतिक मुद्दों, सामाजिक पीड़ाओं पर
साथियों के विचार ध्यान से
सुनने का नाटक करती हूँ

जबकि ठीक उसी समय
जली रोटियों और फीकी दाल के
अपराध बोध से ग्रसित हो उठती हूँ

दो नौकाओं पर सम्भल कर पांव रखती हूँ
पर अस्थि मज्जा से कहीं गहरे
एक पीड़ा अनुभव करती हूँ
भागते दौड़ते जीवन की रेल के
ठसाठस भरे डब्बे में खुद के लिए
सुकून का एक कोना तलाशती हूँ और
भावनाओं में बह, लिख देती हूँ कविताएं

अपनी पीठ ठोक कर
सृजनकर्ता होने का दम भरती हूँ
क्षणिक कोमलता को कठोर शब्दों में
ज़बरदस्ती कैद कर आश्वस्त हो जाती हूँ
मैं मज़बूत हूँ, नहीं बिखरूंगी
स्वप्न लोक की कल्पनाओं को झटक कर
यथार्थ की पथरीली ज़मीं पर पटक दूँगी

आत्म सम्मान का घूँट पिए हूँ
नहीं कहूँगी तुमसे अपने टूटे क्षणों की व्यथा
नहीं कह पाऊँगी कि मेरी दुनिया बहुत छोटी है
नहीं सम्मिलित इसमें लोक कल्याण के भाषण
संस्कारों की बेचारगियां, फेमिनिस्म की बारीकियां

मैं स्वावलम्बी हूँ, सर उठा कर जीने की
महत्वाकांक्षी, पर कोई शिला नहीं
पहाड़ी नदी हूँ, स्वछंद बहती, उच्छ्रिंखल नहीं
इस छोटे से मन की तंग गलियों में अब तक
अपने इंसान होने की सूरत ढून्ढ रही हूँ
हाँ, इतनी आत्मनिर्भर तो हूँ मैं, एक स्वावलम्बी स्त्री !
Anupama

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