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गीत मरते नहीं

पहले सोचा करती थी कि लोग जाने कविताएँ क्यों करते हैं। सीधी साधी भाषा में बात क्यों नहीं कर लेते। परंतु जब मैंने दुष्यंत कुमार जी, महादेवी वर्मा जी, निराला जी सरीखे कवियों की रचनाओं को पढ़ने की कवायद शुरू की तो जाना कि सीधे साधे शब्दों को जब विचारों की सुघड़ कड़ाही में तल, भावों की मधुर चाशनी में डुबो दिया जाता है तो उस मिठास की तुलना तो केवल अमृत से ही की जा सकती है। एक अमरत्व मिल जाता है अंगविहीन शब्दों को, लौकिक दुनिया में शायद ही इसे कोई और उपमा दी जा सके।

geet-marte-nahin वैसे मैंने अभी अभी हिंदी साहित्य के इस महासमुद्र में प्रवेश ही किया है, आचमन मात्र कहा जा सकता है। परंतु मेरा सौभाग्य तो देखिए कि प्रारंभ में ही मुझे एक बेहद सक्षम समकालीन कवि ‘डॉ गोरख प्रसाद मस्ताना’ जी की कविता संग्रह “गीत मरते नहीं’ पढ़ने का मौका मिला।

डॉ गोरख प्रसाद जी बेतिया, बिहार के निवासी हैं और भोजपुरी भाषा में इनके काव्य, गीत व कथा संग्रह छपते रहते हैं। परंतु “गीत मरते नहीं” हिन्दी भाषा में छपा इनका पहला गीत संग्रह है जिसमें उनकी 75 रचनाएँ शामिल की गई हैं।

सरल भाव और उत्तम शैली का बहुत ही प्यारा समन्वय है इनकी कविताओं में। परंतु उससे भी बड़ी बात ये कि हर गीत प्रेम की महीन डोर से बंधा है। विविध रूप हैं इस प्रेम के, कहीं प्रकृति के लिए, कहीं प्रियतमा के लिए, कभी देश के लिए तो कभी मानव मात्र के लिए।

इनका प्रथम गीत “राग दरबारी” जोशीली, हिला देने वाली रचना है जो कहीं न कहीं एक कवि के मन में छुपे उद्गार को उजागर करने के साथ साथ मानव मात्र की पीड़ा को भी उभारती है। साफ शब्दों में कहें तो आधुनिक काल में अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहे मनु पुत्र की सच्ची अभिव्यक्ति।

इस बेहतरीन शुरुआत के बाद मेरी उम्मीदें इस संग्रह से काफी बढ़ गई थीं परंतु इनकी रात्रि सौंदर्य से जुड़ी कविताओं ने तो एक अनूठा समा ही बांध दिया खासकर चांद ने जो कभी प्रियतमा के रूप में उभरा तो कभी नदी में विचरण करता अनोखा जीव। हर रूप, हर विधा में ढाला इन्होंने रात की चांदनी को।

चाहे गांव की गलियों का प्राकृतिक सौंदर्य हो या एक कवि का अपनी कविता के लिए प्रेम। देश के मौजूदा हालात पर तीखी टिप्पणी हो या सामाजिक बुराईयों का मार्मिक चित्रण। मस्ताना जी की लेखनी ने कई पहलुऒं को छुआ और मेरे मानस पटल पर लुभावने चित्र अंकित कर दिए।

आप भी पढ़िए कुछ अंश और लुत्फ़ उठाइए :

1. जब तक नील गगन में रहता लगता मात्र कहानी में
झील में चांद उतर आता तब आग लगाता पानी में

2. देखकर लावण्य तेरा क्या लिखूँ मैं उक्तियाँ
बोल मुझसे ऐ नई कविता की नूतन पंक्तियाँ

3. शीशी टूट गई स्याही की
चारों ओर पसर गई रात
लगता ज्यूँ काले कम्बल में
छिप के आज उतर गई रात

4. मेरे देश हुए तुम बूढ़े क्षमा शब्द ढोते ढोते
क्या थी क्या हो गई आज भारत माता रोते रोते

5. मैं जन्मूँ तो बजा के थाली हर्ष मनाना
मेरा दोष बताना माँ, फिर मुझे मिटाना

कुल मिलाकर बेहद ही उम्दा प्रयास है मस्ताना जी का, इन गीतों को अमर करने का। वाकई गीत कभी नहीं मरते, लेखक की कल्पना से उतरकर सीधे पाठक के हृदय में प्रवेश जो कर जाते हैं। कभी रूलाते, कभी गुदगुदाते, चिरस्थायी तो होते ही हैं।

संग्रह : गीत मरते नहीं
संस्करण : प्रथम (2014)
मूल्य : 200 रूपये
प्रकाशक : शारदा पुस्तक मंदिर
ISBN No. : 81-88501-06-8

10 Comments

  1. संतोष says:

    उच्च स्तरीय समीक्षा, आभार

  2. संतोष says:

    एक शब्द में – लाजबाब

  3. संतोष says:

    उम्दा

  4. धन्यवाद

  5. गागर में सागर। माननीय डॉ गोरख प्रसाद मस्ताना’ जी को मैं बराबर पढ़ता (भोजपुरी) रहता हूँ। उनकी सम-सामयिक रचनाएँ यथार्थता की कसौटी पर पूरी तरह से खरी उतरती हैं……उनका यह हिंदी कविता संग्रह भी अपने आप में अद्भुत है…इसकी यहाँ की गई समीक्षा भी अद्भुत व उम्दा है। सादर।

  6. purushottam prasad says:

    गीत संग्रह अभी पढ़ा तो नहीं लेकिन उसके गीत लेखक से सुन चुका हूँ.गीत बहुत भावुक और मर्मस्पशी है .डॉ साहेब को अनेक बधाइयाँ जिन्होंने गीतों को अमर कर दिया .

  7. सही कहा आपने प्रभाकर जी। इतने सारे भावों को एक ही संग्रह में समेट लेना वाकई प्रशंसनीय है। आपको समीक्षा पसंद आई उसके लिए आभार

  8. जी पुरूषोत्तम जी वाकई अच्छे गीत हैं। मस्ताना जी को साधुवाद

  9. Ramesh Pathania says:

    एक अर्से के बाद इतनी अच्छी पुस्तक समीक्षा पढ़ी। ज्यादतर समीक्षक स्तही तौर पर समीक्षा करते हैं , शायद समय के अभाव या अरुचि के कारण।
    अनुपमा जी ने पुस्तक का सही मूलयांकन किया है।
    लेखक ब समीक्षक दोनों को शुभकामनाएं

    रमेश पठानिया

  10. आभार रमेश पठानिया जी!

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