Hindi Poetry

घनेरी शाम

घने थे बादल गहरा काला आकाश
मद्धम पड़ गया था सूर्य का प्रकाश
टूट कर गिर रहीं थीं पत्तियां
मासूम फूलों की संगियां
पल भर को उड़ती
फिर लहराकर गिर जाती
तेज़ हवाओं के शंखनाद में
अपना अस्तित्व ढूंढती
लगा खो सी गई मेरे दिल की आहट भी
उन पत्तों की सरसराहट में कहीं!

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