Nano fiction

Short poems

Short poems

नमी आँखों में भली न लगे हंसी लबों से चहक के कहे गमों की फ़ेहरिस्त गर लंबी हो जाए तोड़ो मरोड़ो हवा में उड़ा दो जनाब 2.       उदासियों को इतना भी खबूसूरत मत बनाओ.. हंसी शरमा जाएगी ? 3.       आसमां का नीला सागर में घुल मछलियों का मीत हो चला […]

by September 16, 2016 Nano fiction
सूत्रमाला

सूत्रमाला

मरीचिका शायद जीवन का सच भी झूठ भी जीने की आस भी मरने का अहसास भी सब कह सुन लेने की बाद भी जो मुझमें गुनगुनाता है वो मधुर अहसास हो तुम !! ज़्यादा सोचना राई को पहाड़ बना देता है हफ्ते बाद आया इतवार.. कितनी जल्दी फिसलता है न […]

by September 2, 2016 Nano fiction
Haiku

Haiku

Turquoise of Heaven Azure of Ocean Merged An Albatross Blushed !   Tree Tops Swirled Huge Kites Swerved Space Defied Matter   Balloonish Clouds Polka Dotted Sky Ecstasy Spatters!   Mighty Fireball Frailed Moon Arrived in Cuckoo Rail North Star Left a Trail !   Grumpy Forests Smirked Muddy Rivers […]

by June 23, 2016 Nano fiction
वक्र चाल

वक्र चाल

दोपहर के दो बजे, थके मांदे परिंदे पेड़ों की ऊंची डालियाँ छोड़, नन्ही झाड़ियों में छाँव तलाश रहे हैं… आम के पेड़ पर कच्चे फल अनमने से हैं… गर्मी से उनकी खट्टास का आदान प्रदान जारी है… बोझिल पत्ते हौले हौले मंत्रजाप कर रहे हैं… घरों के दरवाज़े खिड़कियां असहनीय […]

by May 18, 2016 Fiction, Fursat ke Pal, Nano fiction
नीरवता

नीरवता

मायूसियों का धुँआ चाँद को छिपा सकता है.. बुझा नहीं सकता… रेतीली आंधियां पल भर को दिशा भ्रमित कर सकती हैं.. जीवन भर के लिये भटका नहीं सकतीं… नीरसता उदास काँटों सी कचोट भले ले… गुलाबों की महक छीन नहीं सकती… मानव मन की जिजीविषा अमर है और रहेगी… क्षणभंगुर […]

by May 9, 2016 Fiction, Fursat ke Pal, Nano fiction
मनपंछी

मनपंछी

मनपंछी प्रातःकाल के सूर्य को देखकर जगता है… कड़ी धूप में अपनी परछाईं में शीतलता खोजता है… साँझ ढले घड़ी भर सांस ले.. अटारी से उतरते सूरज को देख मायूस होने लगता है… कि शर्मीला सा चाँद आँगन में खिल आता है… और मनचकोर चांदनी की अठखेलियों में फिर से […]

by May 8, 2016 Fiction, Fursat ke Pal, Nano fiction
प्रेम अबूझ पहेली

प्रेम अबूझ पहेली

प्रेम अबूझ पहेली है या केवल एक भ्रम….चिरकाल से मानव मन की सबसे जटिल गुत्थी शायद इस अहसास को न समझ पाना ही है…क्या प्रेम काल परिस्थिति भाव अनुसार बदल जाता है या फिर केवल परिभाषाएं बदलती हैं …कुछ वैसे ही जैसे पानी उबलकर भाप में बदलते ही छुअन से […]

by May 2, 2016 Fiction, Nano fiction

विस्थापन

मैडमजी कमिसन तो आ गया, एरियल कब मिलेगा? भाषा का कचूमर बनाती, आवाज़ सुन, याद आ गए मुझे माली काका। कैंडेलबा, देहेलबा, बूग्नबा की पुकार लगाते। मैं पेट पकड़कर हंसती, जब वो केसवा बिस्किट संग लिप्टनवा चाह की चुस्कियां लेते। पर आज सूझा। विस्थापित भाषा हो या इंसान, दूसरों के […]

by November 27, 2015 Nano fiction