Kuch Panne

मार्कण्डेय

मार्कण्डेय

जब सवाल तमक कर उठते हैं, तब मन के किसी कोने में छुपे जवाब चुपचाप, गर्दन झुकाये, खुद को खोज लिये जाने का इंतज़ार करते हैं… आज सुबह मन में चिरंजीवी शब्द ने कौतूहल रचा था.. दिन भर इसी बारे में पढ़ती रही.. कितनी ही कथाएँ, किंवदन्तियाँ, धार्मिक आस्था के […]

by April 11, 2017 Kuch Panne

शब्द

“जब अंधकार हद से गुजर जाए सवेरा नज़दीक होता है। बड़े बूढ़ों ने कहा था। कभी आज़माया नहीं।” लगभग चार साल पहले लिखीं थीं ये पंक्तियां, किसी मुड़े तुड़े कागज़ के टुकड़े पर… शायद तब उजाले की उम्मीद में जीती थी.. नहीं जानती थी कि अंधकार भी उतना ही प्रेरक […]

by April 7, 2017 Kuch Panne
आस्था

आस्था

आज किसी से लंबी चौड़ी बात हुई, उनके धर्म और आस्था के बारे में… सहज उत्सुकता थी मन में, और उनके विश्वास और अभिव्यक्ति के प्रति सरल समर्थन भी.. पर अचानक वे मंदिरों और पूजा पाठ की सभी विधियों पर ऊँगली उठाने लगी.. जबकि हिन्दू धर्म के बारे में उनकी […]

by April 3, 2017 Kuch Panne
होली : फागुन का चांद

होली : फागुन का चांद

धीमे-धीमे गहराती शाम। थका-मांदा सूरज दिन भर की चमक-दमक के बाद अपनी आभा खुद में समेटे,अपनी प्रेयसी संध्या के कांधे पर हाथ डाले आकाश रथ से क्षितिज की ओर अग्रसर हो चला है। होली का दिन था न आज, मस्ती भरा। इंद्रधनुषी थी उसकी सुबह, लाल-पीले-नीले-जामुनी रंगों में चहकती सी। […]

by March 13, 2017 Kuch Panne
कील

कील

आज एक नयी कहानी सुनायी उन्होंने.. किसी मंदिर की मान्यता के बारे में… कि कैसे एक औरत शादी के 30 साल बाद मां बनने का सुख पा सकी… और अपनी मुराद पूरी होने पर घुटनों पर बच्चों सी रिढ़ते हुये मन्दिर के द्वार पर माता का धन्यवाद देने गयी… मैं […]

by March 9, 2017 Fiction, Kuch Panne
Women’s Day

Women’s Day

“घर का काम नहीं करेगी, तो उसे लायी किसलिए हूँ?” तल्ख़ मिज़ाज़ी से उसने कहा.. हम सब थोड़ा सा अचकचाये, फिर कह ही दिया कि इस बात के लिये नहीं होती बेटे की शादी.. इस पर उनका दूसरा पत्ता, “जब मैं ब्याह कर आयी, मैं भी तो करती थी… और […]

by March 8, 2017 Articles, Events, Kuch Panne
सितारे

सितारे

आज हवा में हल्की सी नमी है। बादलों की टुकड़ियां हौले-हौले गश्त लगा रही हैं। नन्हे तारे शर्मीले बच्चों से आसमां में दुबके जा रहे हैं। छदमी चांद बदलियों के बीच हंसता-मुस्काता अंगड़ाईयां ले रहा है। धूसर सा है समां, होली से पहले अक्सर आंधियां चला ही करती हैं। पर […]

by March 5, 2017 Kuch Panne
परिवर्तन

परिवर्तन

ये जो हवाएं चलती हैं फरवरी में, बहुत भाती हैं इस मन को। और क्यों न भाएं, बसंत ऋतुराज यूँ ही तो नहीं। प्रकृति में परिवर्तन, ऊर्जा संचार का सबसे मौलिक रूप ठहरा और मौलिकता प्रभावित करती है मुझे। गर्वीली सरदी अपना कसैलापन लिए विदा होने को है और पतझड़ […]

by February 18, 2017 Kuch Panne