Kuch Panne

होली : फागुन का चांद

होली : फागुन का चांद

धीमे-धीमे गहराती शाम। थका-मांदा सूरज दिन भर की चमक-दमक के बाद अपनी आभा खुद में समेटे,अपनी प्रेयसी संध्या के कांधे पर हाथ डाले आकाश रथ से क्षितिज की ओर अग्रसर हो चला है। होली का दिन था न आज, मस्ती भरा। इंद्रधनुषी थी उसकी सुबह, लाल-पीले-नीले-जामुनी रंगों में चहकती सी। […]

by March 13, 2017 Kuch Panne
कील

कील

आज एक नयी कहानी सुनायी उन्होंने.. किसी मंदिर की मान्यता के बारे में… कि कैसे एक औरत शादी के 30 साल बाद मां बनने का सुख पा सकी… और अपनी मुराद पूरी होने पर घुटनों पर बच्चों सी रिढ़ते हुये मन्दिर के द्वार पर माता का धन्यवाद देने गयी… मैं […]

by March 9, 2017 Fiction, Kuch Panne
Women’s Day

Women’s Day

“घर का काम नहीं करेगी, तो उसे लायी किसलिए हूँ?” तल्ख़ मिज़ाज़ी से उसने कहा.. हम सब थोड़ा सा अचकचाये, फिर कह ही दिया कि इस बात के लिये नहीं होती बेटे की शादी.. इस पर उनका दूसरा पत्ता, “जब मैं ब्याह कर आयी, मैं भी तो करती थी… और […]

by March 8, 2017 Articles, Events, Kuch Panne
सितारे

सितारे

आज हवा में हल्की सी नमी है। बादलों की टुकड़ियां हौले-हौले गश्त लगा रही हैं। नन्हे तारे शर्मीले बच्चों से आसमां में दुबके जा रहे हैं। छदमी चांद बदलियों के बीच हंसता-मुस्काता अंगड़ाईयां ले रहा है। धूसर सा है समां, होली से पहले अक्सर आंधियां चला ही करती हैं। पर […]

by March 5, 2017 Kuch Panne
परिवर्तन

परिवर्तन

ये जो हवाएं चलती हैं फरवरी में, बहुत भाती हैं इस मन को। और क्यों न भाएं, बसंत ऋतुराज यूँ ही तो नहीं। प्रकृति में परिवर्तन, ऊर्जा संचार का सबसे मौलिक रूप ठहरा और मौलिकता प्रभावित करती है मुझे। गर्वीली सरदी अपना कसैलापन लिए विदा होने को है और पतझड़ […]

by February 18, 2017 Kuch Panne

रोटियां

आजकल रोटियां गोल नहीं बनती मुझसे… किनारे टेढ़े मेढ़े हो जाते हैं… कहीं मोटी कहीं पतली… जाने क्यों कुछ हिस्से अधपके रह जाते हैं…. सब्ज़ी में नमक कम, मिर्ची ज़्यादा डाल देती हूँ… दूध उबल-उबल गाढ़ा हुए जाता है… दाल मैं कच्ची ही उतार लेती हूँ… कढ़ाही में कड़छी चलाते […]

by February 10, 2017 Kuch Panne
ये मन

ये मन

ये मन कभी-कभी अनजाने ही आप कुछ लोगों के बेहद करीब आ जाते हैं। खास जगह बन जाती है उनकी आपकी ज़िंदगी में। और कभी बस यूं ही किसी से इतने परेशान कि सामने आना दूर की बात, समय-असमय हुआ टकराव भी चुभने लगता है। किस पर मढ़ें दोष? उन […]

by February 9, 2017 Kuch Panne, My Published Work
दीवा

दीवा

“बापू सोड़े में चांदना दीखे है…. दीवे ने फूंक मार दे… दीखना बंद हो जाऊगा” हंसते हुए अपनी भाषा में एक जोक सुनाया उन्होंने, हरयाणवी की खड़ी बोली का स्वाद लेने के बाद मैंने हिंदी रूपांतरण पूछा… वो कहने लगे एक लड़के की रजाई पुरानी हो गयी थी, उसने पिता […]

by January 21, 2017 Kuch Panne