Hindi Poetry

बादल

बादल

देखा यूं ही ध्यान से अभी वो आसमां न चांद दिखा न तारे कि छितरे काले मेघा झूमते पेड़ दिखे, गाती वायु घंटियाँ पल पल जीने को आतुर उन्मुक्त बदलियाँ हवा की सरसराहट भी थी उनमें पत्तों की फड़फड़ाहट भी आ रही है धीमे धीमे जीने की आहट भी!

by June 15, 2014 Hindi Poetry
शनि

शनि

Noticed the planet Saturn in sky tonight and couldn’t stop myself from writing this poem “आज पहली बार हुआ कि चांद देखा पर नज़र इक तारे पे अटक गई चांद में कमी न थी वो तो है ही हसीन पर उस तारे में कुछ बात थी न अपनी चमक को […]

by May 9, 2014 Hindi Poetry
वो आग का गोला

वो आग का गोला

अभी अभी सूरज को भगा के आई हूँ पश्चिम के अंधेरे कोने में दबा के आई हूँ पर है बड़ा ही ज़िद्दी जानती हूँ कल पूरब से फिर आ धमकेगा हंसता मुस्कुराता आग बरसाता कोई बात नहीं हम भी तैयार हैं बादलों का झुंड लिए!

by May 1, 2014 Hindi Poetry
शब्द : अर्थ

शब्द : अर्थ

आशंकाएं अपेक्षाएं अभिलाषाएं जितने कठिन शब्द उतने ही गहरे मतलब पग भरते ही मंज़िल के दूर होने का डर मंज़िल मिल गई तो देर होने का डर ऊंचाई पर पहुंच फिसल जाने का डर यही तो है न आशंका? कर्म करते ही फल मिलने की आशा बीज बोते ही पेड़ […]

by April 22, 2014 Hindi Poetry
जिज्ञासु

जिज्ञासु

मैं जिज्ञासु हूं। जानना चाहता हूं अपने होने का मतलब। वो एक कारण जिसके लिए मैंने इस धरती पर जन्म लिया। उन लोगों से मिला जो मुझसे अलग थे। उन कामों को किया जो मेरे प्रतिकूल थे जाने अनजाने कितने ही श्रम किए, कितनों से जी चुराया। कितनी ही मृगतृष्णाओं […]

by April 22, 2014 Hindi Poetry
गीली रेत

गीली रेत

गीली रेत के सीने पर लिखती हूं उंगलियों से अपना नाम खो जाता है अगले ही पल सागर की चंचल लहरों में बिना छोड़े कोई निशां। पर नहीं लील पाता समुद्र भी भीगी बालू के निस्वार्थ प्रेम को उस भोले निमंत्रण को क्षणभंगुर मन के बेबाक यंत्रों को। अपनी हठधर्मिता […]

by April 21, 2014 Hindi Poetry
फूलों की लड़ियाँ

फूलों की लड़ियाँ

लाल पीले फूलों की लड़ियां दीवारों पे लटकती पुरानी जर्जर इमारतें भी नए रंगों में चहकती। जिन बेजान पत्थरों में अपनी याद भी बाकी नहीं पुष्पों के संपर्क से सजीव हो चले ज्यों पैदा ही हुए हों महकने के लिए। बसंत क्या आई रूप ही बदल गया दीवारें बोल उठीं […]

by April 20, 2014 Hindi Poetry
परिवर्तन

परिवर्तन

परिवर्तन – प्रकृति का शाश्वत नियम विस्मरणीय, अकथनीय सुख की अनुभूति, असहनीय त्रासदी शीतल मंद पवन सा सुगंधित ज्येष्ठ की ऊष्णता से अद्वेलित। परिवर्तन – स्वयं में एक अपवाद प्रशंसनीय, शोचनीय शशि सा शीतल, रवि सा आग्नेय शिखर सा प्रज्वलित धरती सा आरोहित। परिवर्तन – नियति का अनूठा संगम मेरा […]

by April 20, 2014 Hindi Poetry