Hindi Poetry

निद्रा

निद्रा

आंखें मूंदकर नींद का इंतज़ार करना भी एक अजीब सज़ा है। दिमाग सौ की रफ्तार से भाग रहा है दिल जाने किन यादों में डूबे जा रहा है और दिलोदिमाग की इस कशमकश का पूरा फायदा निंदिया रानी उठा रही हैं। जैसे कोई शिशु आनंदित हो इस बात से कि […]

by April 11, 2014 Hindi Poetry
दर्द

दर्द

दर्द श्वेत है दर्द श्याम है बच्चन की रोबीली आवाज़ में ये बात जितनी मार्मिक लगती थी दरअसल उतनी है नहीं। जब कल मेरे पांव में मोच आई तो अहसास हुआ दर्द तो बेरंग है और फिलहाल जल्दबाजी का फल है इसके आगे मूव और झंडु बाम भी फेल हैं। […]

by April 10, 2014 Hindi Poetry
प्रतिबिम्ब

प्रतिबिम्ब

कहते हैं आईना कभी झूठ नहीं बोलता खोल देता है राज़ सारे छुपा के रखे हों जो ज़ख़्म करारे। हम भी बैठ गए इस बात को आजमाने खुद को अपने ही प्रतिबिम्ब से मिलाने। कुछ पल दर्पण में ध्यान से देखा बाल बनाए संवारी चेहरे की रूपरेखा। और फिर झांकना […]

by April 9, 2014 Hindi Poetry
अधजले कागज़ के टुकड़े

अधजले कागज़ के टुकड़े

बिखरे थे अनजान गली के मोड़ पर अधजले कागज़ के कुछ टुकड़े मुड़े तुड़े कुछ काले कुछ उजले। थे शायद किसी टूटे दिल की दर्द भरी सिसकियां प्रेम से संजोई गुस्से में जलाई आखिरी पातियां। या थे किसी बेरोज़गार के नामंज़ूर हुए आवेदनों की वेदना बार बार की विफलता से […]

by April 4, 2014 Hindi Poetry
सेमल के फूल

सेमल के फूल

सेमल के फूल देख आज आप बहुत याद आए देख लाल पुष्प मानस पटल पर कई चित्र उभर आए। याद आया वो गुज़रा ज़माना जब ये फूल हमारी सैर का हिस्सा होते थे उनका आकार प्रकार एक नया किस्सा होते थे। पूछते थे लोग अक्सर क्यों धूप में यों भटकती […]

by April 2, 2014 Hindi Poetry
घनेरी शाम

घनेरी शाम

घने थे बादल गहरा काला आकाश मद्धम पड़ गया था सूर्य का प्रकाश टूट कर गिर रहीं थीं पत्तियां मासूम फूलों की संगियां पल भर को उड़ती फिर लहराकर गिर जाती तेज़ हवाओं के शंखनाद में अपना अस्तित्व ढूंढती लगा खो सी गई मेरे दिल की आहट भी उन पत्तों […]

by April 1, 2014 Hindi Poetry
सूरज कुछ आधा सा

सूरज कुछ आधा सा

चांद तो सबने देखा होगा आज मैंने सूरज देखा कुछ आधा सा काले बादलों के आगोश में समाता सा। अपनी लालिमा को समेटता मेघ की कालिमा बटोरता नये आशिक की तरह कभी ऐंठता कभी शर्माता सा। सहसा ख्याल आया ये कैसा मिलन? प्रकृति के प्रतिकूल नियमों का उल्लंघन! भिन्न भिन्न […]

by March 30, 2014 Hindi Poetry
सजीव निर्जीव

सजीव निर्जीव

बचपन में कभी सजीव निर्जीव का अंतर समझा था। सजीव वो जो चलता है बोलता है सांस लेता है सोचता है निर्जी व वो जो,है इससे बिल्कुल उलट दिखने में सुंदर पर असल में मरघट! कुछ बड़ी हुई तो इस अंतर पर गौर करने लगी अपनी तुलना पेड़ पौधों पंछियों […]

by March 27, 2014 Hindi Poetry