Hindi Poetry

एक स्वावलम्बी स्त्री

एक स्वावलम्बी स्त्री

आत्मनिर्भर हूँ मैं, एक स्वावलम्बी स्त्री पुरुषों के समाज में कांधे से कांधा मिलाती स्वाधीन भारत के निर्माण में कहीं कोई छोटा सा योगदान दे खुद को जागरूक नागरिक सामाजिक प्राणी, एक सम्मानित इकाई सिद्ध करने का भरसक प्रयास करती हाई हील पहनकर सीमेंट के फर्शों पर खटर पटर चलते […]

by November 27, 2015 Hindi Poetry

क्षणिक 1

बन्द आँखों से ईश्वर ढूंढती रही उम्र भर नज़रें मिलीं और वो दिख गया वक़्त की पाबन्द हो चली हूँ तुझसे दूर बीते हर लम्हे का हिसाब रखती हूँ 108 मनकों की माला फेर, दुनिया जोगी कहलाये अनगिन साँसों में जप, उसका नाम, ‘वो’ बावरी हुई जाये जागते हुए ख़्वाब […]

by November 24, 2015 Hindi Poetry
महानगरीय कोने

महानगरीय कोने

ईंट गारे से बने मकान भाते हैं मुझे नन्ही इकाईयां एक हो जाएँ तो कितनी मज़बूत है ज़िन्दगी हौले से बताते हैं मुझे पर आज की सुबह कुछ अलग है मार्बल कटने की तीखी आवाज़ कानों में पिघला शीशा घोल रही है ड्रिलिंग मशीन कर्कश स्वर में जाने कौन से […]

by November 24, 2015 Hindi Poetry
सूफियाना चाँद

सूफियाना चाँद

ज़मीं से आस्मां तक होकर मद में चूर अमावस से पूनम तक बदले कितने रूप और एक है वो सूफियाना चाँद मेरा सोलह कलाएं खुद में समेटे चुपचाप है बैठा 🙂 Anupama

by November 24, 2015 Hindi Poetry
बेचैनी

बेचैनी

जहां भी रहूँ इक नज़र दरीचे से उलझी रहती है उसके आने की आहट अक्सर सुनाई देती है उचककर दहलीज़ तक जाती हूँ और हवा के मासूम मज़ाक से तड़प जाती हूँ सूरज के सीढ़ियां उतरते उतरते उम्मीद भी उनींदी होने लगती है चाँद को तकिया बना तारों से बतियाने […]

by November 24, 2015 Hindi Poetry
सामाजिक न्याय

सामाजिक न्याय

निश्छल आँखें खारे आंसू भोली मुस्कान बिखरे बाल शरारती भवें पसरे हाथ सड़क किनारे पलते उस बचपन को देखकर सीने में हूक सी उठती है कर्मों का लेखा जोखा ईश्वरीय चमत्कार सामाजिक न्याय खोखले से शब्द कलेजे में पिघले शीशे से उतर आते हैं और सोचने लगती हूँ कुछ आरम्भ […]

by November 24, 2015 Hindi Poetry
निराशा के घटक

निराशा के घटक

नन्हीं सी बारिश की बूँद में उफनता समन्दर देखा है कभी ? मिट्टी से सने बीज की कोख में पनपता विशाल पेड़ देखा है कभी ? शहतूत की पत्तियों पर लाचार रेंगता रेशमी कीड़ा देखा है कभी ? साबुन के पानी में निढाल पड़ा रंगीन बुलबुला देखा है कभी ? […]

by November 24, 2015 Hindi Poetry
सर्दियों की शामें

सर्दियों की शामें

सर्दियों की शामें कितनी शर्मीली होती हैं न नरम सूरज के ताप से गुलाबी हुए गाल घने केसुओं की ओट में छिपाए कितनी ख़ामोशी से चाँद के आगोश में पिघल जाती हैं चमकते दमकते सितारों को दामन में काढ़ नई नवेली दुल्हन सी बदलियों की पायल छनकाती रात की दहलीज़ […]

by November 24, 2015 Hindi Poetry