Hindi Poetry

बेड़ियां

बेड़ियां

कितनी बेड़ियों में जकड़े हैं किससे कब कितना कहना कहाँ कब कैसे सिमट लेना कितनी हदें, कितनी बंदिशें अनगिनत ख़्वाब, बेहिसाब ख्याल और एक अजानी सी चुप जाने ये बुलबुले टूटते कैसे नहीं Anupama

by February 18, 2017 Hindi Poetry
बाकी

बाकी

न जीने की जुस्तजू न मरने का इरादा बाकी है रक़्स ओ अक़्स हुए फना रस्म ए कफ़न बाकी है ख्यालोंं के अलाव में, मासूम हर्फ़ राख हुए टुकड़ों का होश नहीं, मुठ्ठी भर रूह बाकी है ज़लज़ले के खेल में, ख्वाब सारे गर्त हुए ज़ख्मों का मालूम नहीं, चोटों […]

by February 12, 2017 Hindi Poetry
कजली

कजली

कजली आँखें, गाल गुलाबी पायल छनके जाए गुपचुप देखे अपना कान्हा बावरी भटकी जाए ठुमक ठुमक चले जो प्यारी बगिया महकी जाए बंसी, गोपी, गाँव की गोरी सारी छोड़ के आए नन्हे कान्हा बेरी समेटे पीछे भागे अाए जैसे ही दिखे सांवरा भृकुटि तनी दिखाए खट्टी इमली भाती मुझको काहे […]

by February 10, 2017 Hindi Poetry
तन्हाई

तन्हाई

One of my very first poems n A personal favorite यूं ही चहलकदमी करते-करते अहसास हुआ कितनी करीब हो तुम मेरे, इसका आभास हुआ। हर सुख में, हर दुख में, हर दर्द में, हर गर्त में तुम्हीं तो थी साथ मेरे, मज़बूती से थामे हाथ मेरे। बचपन में जब सखियां […]

by February 9, 2017 Hindi Poetry
चौराहे के कबूतर

चौराहे के कबूतर

आज मेरी बस चौराहे के बिल्कुल पास खड़ी थी समीप ही कबूतरों की पूरी टुकड़ी बिखरे दाने समेटने में जुटी थी स्लेटी काया नीला कंठ बटन सी आंखें गहरे गुलाबी छितराए से नन्हें नन्हें पांव गर्दन मटकाते पंख फुलाते ढुलमुल सी चाल चलते भोले से कबूतर बड़े प्यारे लग रहे […]

by January 23, 2017 Hindi Poetry
वास्तविक

वास्तविक

किसी ने कहा ये क्या हर पल फूल पौधों पेड़ों पक्षियों पर लिखती हो कुछ वास्तविक लिखो सड़कों के गढ्ढों पर बढ़ते करप्शन पर विफल हो चुके प्रशासन पर गरीबों के उत्थान पर। हमने भी जुगत भिड़ाई सोचा चलो इनसे भी दो दो हाथ कर लें भाई! विचारने लगे हम […]

by January 18, 2017 Hindi Poetry
अक्षर

अक्षर

अक्षर अक्षर बुनते शब्द शब्द चुनते लबों पे मुस्कान लिए मुलायम सपने गुनते अक्सर छप जाते हैं उँगलियों के निशां उन कोरे पन्नों पे छूती हूँ उन्हें प्यार से कलेजे से लगा लेती हूँ बिन कहे बिन लिखे बस इक फ़साना यूँ ही गुनगुना लेती हूँ Anupama

by January 17, 2017 Hindi Poetry

उम्मीदों का दामन

विचारों के रेले को दूर धकेल मनचाहा गन्तव्य सुनिश्चित करती हूँ जबकि भली भांति जानती हूँ कि इस जीवन-रेल की समय सारिणी अनन्त काल से अनियमित है समय घड़ियों में नहीं, मन में बीतता है कितना भागो, कितना पकड़ो, कितना भोगो, कितना सोचो काल दो कदम आगे ही दिखता है […]

by January 16, 2017 Hindi Poetry