Hindi Poetry

इंसानियत

इंसानियत

अखबार नहीं पढ़ती अब पोर जलते हैं मेरे समाचार नहीं देखती मन हुलसता है पर चली आती हैं गर्म हवाएं दिल जलाती, आत्मा कचोटती पक्ष प्रतिपक्ष निर्धारित करती इंसानियत अपने ही पांव पर कुल्हाडा मार दूसरों के ज़ख्म पर नमक मलती चुप हो गई हूं, नहीं जानती मैं गलत हूं […]

by April 14, 2018 Hindi Poetry
देह

देह

प्रकृति बन पौरुष सहर्ष स्वीकारती तुम सभ्यता के उत्थान में योगदान देती तुम स्वयं से पहले, परिवार, समाज को पूजती तुम सदियों से बर्बरता झेल, कोमल ह्रदय सहेजती तुम कुछ न समझा तुमने जानते बूझते आंखें मूंदे रही तुम्हें आभास भी न हुआ हर जगह, हर समय तुम केवल देह […]

by April 12, 2018 Hindi Poetry
नाटक

नाटक

भूलना हो तो इतना याद करो कि वो अहसास नहीं अभ्यास बन जाए वास्तविक अनुभव नहीं आभास बन जाए पल पल रटा गया नाम अस्तित्व खो बैठता है क्षण क्षण झलकता प्रतिबिंब निर्जीव हो उठता है मूर्तियां गढ़ दो, आदर्श खो जायेंगे सूक्तियां रच दो, सूत्र मिट जाएंगे बांधो काल्पनिक […]

by March 29, 2018 Hindi Poetry
तहें

तहें

by March 16, 2018 Hindi Poetry
मुबारकबाद

मुबारकबाद

तुमने रंगीनियों को चाहा शीशों से इमारतों को सजा दिया मैंने रंगों को चाहा तितलियों को हथेली पर बिठा लिया तुमने संगीत को चाहा सुरों को राग ताल में साध लिया मैंने सुरों को चाहा बुलबुल के गीतों में खुद को भुला दिया तुमने अमीर होना चाहा सिक्कों की खनक […]

by March 11, 2018 Hindi Poetry
नसों में नमक

नसों में नमक

by March 10, 2018 Hindi Poetry
प्रेम या देह

प्रेम या देह

प्रेम प्रेम प्रेम रटने वाले देह देह देह चखने वाले रचेंगें शब्द बेचेंगें भाव और फिर आंखें मूंद, मौन धर दर्शन की पीठ चढ़ लेंगे एक और कश खीसें निपोर कहेंगे स्त्री तुम महान हो हमारा सम्मान हो यूं ही बेवकूफ बनती रहना….. Anupama Sarkar

by March 8, 2018 Hindi Poetry
प्रमाद

प्रमाद

पक्ष विपक्ष तर्क वितर्क के तराजू में भाव हल्के पड़ते जाते हैं जर्जर होते तन और क्षीण पड़ते मन के उद्गार कंठ में सिमटे रह जाते हैं मंथर बुद्धि क्षिथिल धड़कन कांपते हाथ फिसलते पांव बढ़ती आयु के ही परिचायक नहीं कहीं भीतर, गहरे, बहुत गहरे रिसते घावों की टीस […]

by March 4, 2018 Hindi Poetry