Fursat ke Pal

नीरवता

नीरवता

मायूसियों का धुँआ चाँद को छिपा सकता है.. बुझा नहीं सकता… रेतीली आंधियां पल भर को दिशा भ्रमित कर सकती हैं.. जीवन भर के लिये भटका नहीं सकतीं… नीरसता उदास काँटों सी कचोट भले ले… गुलाबों की महक छीन नहीं सकती… मानव मन की जिजीविषा अमर है और रहेगी… क्षणभंगुर […]

मनपंछी

मनपंछी

मनपंछी प्रातःकाल के सूर्य को देखकर जगता है… कड़ी धूप में अपनी परछाईं में शीतलता खोजता है… साँझ ढले घड़ी भर सांस ले.. अटारी से उतरते सूरज को देख मायूस होने लगता है… कि शर्मीला सा चाँद आँगन में खिल आता है… और मनचकोर चांदनी की अठखेलियों में फिर से […]

उमस

उमस

सुनहला सूरज अपने सातों घोड़ों संग सुबह से ड्योढ़ी पे आस लगाये बैठा है …. चीलों की सीटियां …. गिलहरी की टिकटिक … मैना की कैं कैं सुनके भी अनसुना करता शांत भाव से मुस्कुराता हुआ हामी की इंतज़ार करता … कि कब बदलियों का इशारा हो और .. ओस […]

by May 8, 2016 Fiction, Fursat ke Pal
ये मन

ये मन

कभी-कभी अनजाने ही आप कुछ लोगों के बेहद करीब आ जाते हैं। खास जगह बन जाती है उनकी आपकी ज़िंदगी में। और कभी बस यूं ही किसी से इतने परेशान कि सामने आना दूर की बात, समय-असमय हुआ टकराव भी चुभने लगता है। किस पर मढ़ें दोष? उन अदृश्य तरंगों […]

by May 8, 2016 Fursat ke Pal
वो कौन थी

वो कौन थी

आज फिर से उन्हीं गलियों से सामना हुआ। वही घूमती सड़कें, वही झूमते पेड़ और वही बूढ़ी अम्मां ! मेरा इस जगह से परिचय काफी पुराना है। एक समय था जब रोज़ यहाँ से गुज़रा करती थी। घंटे भर का सफ़र होता था घर से दफ्तर का। बस यूं ही […]

by May 4, 2016 Fiction, Fursat ke Pal
स्मृति

स्मृति

ये मन भी न अजीब है। गर्मियों की इस ऊबाऊ दोपहर में भी शीतल हवाओं से लबालब। याद आ रहा है मुझे वो भीगा सा मंजर जब पहली बार सागर की लहरों को महसूस किया था। सूरज सर पर था। धूप भी तेज। शायद वक्त भी अमूमन यही। पुरी का […]

by May 4, 2016 Fursat ke Pal
अंगड़ाई

अंगड़ाई

सुबह 6 बजे अंगड़ाई लेती उनींदी अँखियों में जब लिशकाते सूरज की किरणें काँटों सी चुभें तो मन करता है न बादलों की चादर सर पे ओढ़ लेने का ! रोम रोम पुकारने लगता है उस शरारती चाँद को जो अपनी ठंडक खुद में समेटे चुपचाप रात्रि के तीसरे पहर […]

by May 4, 2016 Fursat ke Pal
A Rainy Day

A Rainy Day

A Rainy Day तुम अक्सर कहते थे हमारी टाइमिंग मैच नहीं होती। सच भी है.. मैं पूरब हूँ तो तुम पश्चिम। न सोच एक सी न जीने का ढंग। एक जैसे होकर भी कितने जुदा हैं हम। और तो और ये मौसम भी साथ नहीं देता। गर्मी और लू में […]

by May 3, 2016 Fiction, Fursat ke Pal