Fursat ke Pal

Dragon Fly

Dragon Fly

कल रात हमने Dragon Fly को सोते देखा। अब आप कहेंगे इसमें नया क्या किया। सोते तो सभी हैं। घोड़े खड़े-खड़े, इंसान पड़े-पड़े। पर नहीं, ये कुछ अलग ही अंदाज़ था। शाम गहरा चुकी थी। स्याह आसमां बिन चांद तारे सूना सा लग रहा था और एक अजीब सी घुटन […]

by October 5, 2016 Fursat ke Pal
हसीन सुबह

हसीन सुबह

इंद्रधनुष का सतरंगा लहरिया.. अमरुद के लालगी ओढ़े बुढ़ाते पत्ते.. अर्जुन के धूसर बीज.. मखमली घास का मीलों बिछा कालीन… मस्ती में सिर उठाये हवा के हिचकोले पर मटकते कबूतर, कागे, मैना, कोयल… वातावरण में रची बसी पुराने पत्तों… सूखे बीजों की खुशबू… गगन चूमते मदमाते पेड़ों की डालियाँ.. बदरपुर […]

by October 5, 2016 Fursat ke Pal
चंचल रात

चंचल रात

चंचल रात उनींदी अँखियों से काजल पोंछते धीमे धीमे विदा हो रही है …. आसमान के आगोश में दूज का चाँद उबासियां ले रहा है …. हवाओं संग अठखेलियां करते थके मांदे हरसिंगार …. नारंगी पांवों को हौले से ज़मीं पे टिका नींद के हिंडोले में ऊंघ रहे हैं … […]

by September 16, 2016 Fursat ke Pal
शोर

शोर

आसपास के शोर को अनदेखा करती.. धीमे-धीमे अवचेतन में उभरते विचारों की तहें उलटती पलटती हूँ.. डायरी के पन्नों में रखा सुर्ख गुलाब, अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को सूखी पंखुरियों में समेटे… मुझे कनखियों से देखता है… महसूसना सतही नहीं हो सकता… पोरों से छू… कोरों से छलकने वाले एहसास… परत […]

by September 7, 2016 Fursat ke Pal
अब नहीं

अब नहीं

अब नहीं कुरेदती मैं मन को.. आहत होना.. ज़ख्मों का रिसना.. आंसुओं का उमड़ना.. किसी छोटी सी बात पर भावुक हो जाना… झट दिल का बोझ हल्का करने को मुस्कुरा देना… हाथ बढ़ा कर कहना कि सखी संग हूँ मैं तुम्हारे.. दो चार शब्दों में उसकी व्यथा सुन लेना.. दो […]

by July 22, 2016 Fursat ke Pal
मेट्रो स्टेशन तक

मेट्रो स्टेशन तक

कीचड़ में सने पाँव भी कभी कभी महंगे परफ्यूम से कहीं ज़्यादा सुख देते हैं… जब मन मौसम छटपटा कर भीग जाना चाहे तो उमस की भभकती आग भी सुहानी लगने लगती है…एक उम्मीद साथ लाती है न … भीग जाने की…. इंतज़ार जब हद से गुज़र जाये तो वस्ल […]

by July 17, 2016 Fiction, Fursat ke Pal
गुब्बारा

गुब्बारा

आज किसी ने जीवन मृत्यु का रहस्य समझाया मुझे.. कहने लगा.. हमें उम्र नहीं सांसें मिलीं हैं जीने के लिए.. उम्र के मानक तो हमारे अपने बनाये हैं.. दिनों, महीनों, वर्षों में बंटे.. जाली.. दरअसल तो सिर्फ सांसें मिलीं हैं.. इन्हें उच्छ्वास में ज़ाया न करो.. न किसी से नाराज़ […]

by July 15, 2016 Fursat ke Pal
आसमां

आसमां

एक और सुबह.. थोड़ी धूपीली… थोड़ी भीगी… सूरज बादलों से नाराज़ है.. ताकाझांकी करती चटकीली किरणें पिघला देना चाहती हैं रुई के खारे टुकड़ों को… नमक छूटकर गिरे धरती पर… दरारें पट जाएं… जा जमे उस दीवार पर… जो बदरंग हो चली है… पार्क की रेलिंग अपने काले रंग पर […]

by July 15, 2016 Fursat ke Pal