Fursat ke Pal

उधेड़बुन

उधेड़बुन

जीवन में कुछ भी निश्चित नहीं….हरेक पल नई चुनौती सा मुंह बाए खड़ा रहता है…स्वप्न लोक में बुनी अभिलाषाएं जाग्रित होते ही हवा में छूमंतर हो जाती हैँ…..बंद आंखों की किवाड़ों में सेंध लगाती किस्मत की परछाई से हर घड़ी जूझना होता है….क्षणभंगुर कहलाने वाले इस मृत्प्राय शरीर को अनथक […]

by November 28, 2016 Fursat ke Pal
हसीन ख़्वाब

हसीन ख़्वाब

चारों ओर फैला गहरा धुंआ… आँखों में किनमिन, सांसों में किरकिर.. शहर का हाल अजब.. दिन में सूरज फीका.. रात में चाँद सितारे नदारद.. फिज़ा सर्द है पर हवा लापता.. शायरी तो छोड़िये, कलाम भी मानो हड़ताल पर बैठ गया.. पर फिर भी ये मन, इस पर ज़ोर कहाँ… जाने […]

by November 6, 2016 Fursat ke Pal
शामियाना

शामियाना

घर लौटते वक्त बड़ा सा शामियाना दिखा मुझे। चार पांच Micky Mouse झूल रहे थे गेट पर और विशाल Mary Go Round चमकीले बल्बों की रोशनी बिखेरता घूम रहा था अपनी धुरी पर। शायद बच्चे का जन्मदिन मनाया जा रहा था। खुशियों के रंग खूबसूरत रंगरलियों के संग। कितना मधुर […]

by October 5, 2016 Fursat ke Pal
Dragon Fly

Dragon Fly

कल रात हमने Dragon Fly को सोते देखा। अब आप कहेंगे इसमें नया क्या किया। सोते तो सभी हैं। घोड़े खड़े-खड़े, इंसान पड़े-पड़े। पर नहीं, ये कुछ अलग ही अंदाज़ था। शाम गहरा चुकी थी। स्याह आसमां बिन चांद तारे सूना सा लग रहा था और एक अजीब सी घुटन […]

by October 5, 2016 Fursat ke Pal
हसीन सुबह

हसीन सुबह

इंद्रधनुष का सतरंगा लहरिया.. अमरुद के लालगी ओढ़े बुढ़ाते पत्ते.. अर्जुन के धूसर बीज.. मखमली घास का मीलों बिछा कालीन… मस्ती में सिर उठाये हवा के हिचकोले पर मटकते कबूतर, कागे, मैना, कोयल… वातावरण में रची बसी पुराने पत्तों… सूखे बीजों की खुशबू… गगन चूमते मदमाते पेड़ों की डालियाँ.. बदरपुर […]

by October 5, 2016 Fursat ke Pal
चंचल रात

चंचल रात

चंचल रात उनींदी अँखियों से काजल पोंछते धीमे धीमे विदा हो रही है …. आसमान के आगोश में दूज का चाँद उबासियां ले रहा है …. हवाओं संग अठखेलियां करते थके मांदे हरसिंगार …. नारंगी पांवों को हौले से ज़मीं पे टिका नींद के हिंडोले में ऊंघ रहे हैं … […]

by September 16, 2016 Fursat ke Pal
शोर

शोर

आसपास के शोर को अनदेखा करती.. धीमे-धीमे अवचेतन में उभरते विचारों की तहें उलटती पलटती हूँ.. डायरी के पन्नों में रखा सुर्ख गुलाब, अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को सूखी पंखुरियों में समेटे… मुझे कनखियों से देखता है… महसूसना सतही नहीं हो सकता… पोरों से छू… कोरों से छलकने वाले एहसास… परत […]

by September 7, 2016 Fursat ke Pal
अब नहीं

अब नहीं

अब नहीं कुरेदती मैं मन को.. आहत होना.. ज़ख्मों का रिसना.. आंसुओं का उमड़ना.. किसी छोटी सी बात पर भावुक हो जाना… झट दिल का बोझ हल्का करने को मुस्कुरा देना… हाथ बढ़ा कर कहना कि सखी संग हूँ मैं तुम्हारे.. दो चार शब्दों में उसकी व्यथा सुन लेना.. दो […]

by July 22, 2016 Fursat ke Pal