Fursat ke Pal

पूर्णाहुति

पूर्णाहुति

अ से अनार, आ से आम, इ से इमली, ई से ईख : क्यों, याद आई न वो रंगबिरंगी किताब जिससे अक्षर पढ़ने व लिखने सीखे थे कभी। बोलना तो बहुत पहले आ गया था। आखिर मम्मी-पापा, दादी-दादा से गुड्डे-गुड़ियों, कुत्ते-बिल्लियों के नाम सीख लेने के बाद ही तो जाते […]

by October 27, 2014 Fiction, Fursat ke Pal
लेखनी

लेखनी

कभी कभी लिखना एक बंदिश सी होती है। जैसे सब बनावट हो कोई खलल है जिसे जी तोड़ पेपर पर उतारने की कोशिश की जा रही है। पर कोई रंग उभर नहीं रहा। कलाकृति को गढ़ने के लिए मूर्तिकार लगातार पत्थर पर वार पे वार किये जा रहा है पर […]

by August 20, 2014 Fursat ke Pal
मन

मन

आज कलम हाथ में आई तो लगा जैसे विचारों का रेला बाँध तोड़ने की फिराक में सजग बैठा है। किसी पहाड़ी नदी सा पूरे उफान पर है। बिना किसी किश्ती का इंतज़ार किये बस कूद पड़ना चाहता है । बिना सोचे समझे कि खिवैया है भी कोई पार लगाने लायक […]

by August 20, 2014 Fursat ke Pal
कहानी

कहानी

कहानियाँ, फलसफे, अफसाने…बचपन से ही चाव से पढ़ती रही। कुछ गुदगुदातीं, कुछ सोचने पर मज़बूर कर जातीं कि आखिर कल्पना के कौन से अथाह सागर से निकलती हैं ये या सच में असलियत ही होती हैं, बस, भाषा का तड़का लगता है। पर खुद कलम उठाई तो लगने लगा कि […]

by June 22, 2014 Fursat ke Pal
सृजन

सृजन

मत रोको विचारों के प्रवाह को, शब्दों की धार को, नदी के बहाव को। रूकते ही आक्रामक हो जाते हैं। सब बंधन तोड़ रिसावों से बहने लगते हैं। कुरेदने लगते हैं धरातल, खोखला हो जाता है रसातल और टूटने लगती हैं वो दीवारें, वो अवरोध जो बीच आ खड़े हुए। […]

by June 19, 2014 Fursat ke Pal
इंतज़ार की घड़ियां

इंतज़ार की घड़ियां

जब अंधकार हद से गुजर जाए सवेरा नज़दीक होता है। बड़े बूढ़ों ने कहा था। कभी आज़माया नहीं। उठ ही नहीं पाई कभी इतनी सुबह। चैन की नींद सोती रही न हमेशा। पर जब रात आंखों आंखों में गुज़रने लगे तो ऐसी सुनी सुनाई बातों पे ही विश्वास करने का […]

by April 24, 2014 Fursat ke Pal