Fursat ke Pal

जंगल बैबलर्स

जंगल बैबलर्स

“दो कानों में एक सर कर देना है तेरा” वो आंखें दिखाकर कहतीं और मैं फ्राक का सिरा मुंह में डाल चुपचाप बैठ जाती, टुकुर टुकुर दीदी को देखती और उनके होंठों पर मुस्कान की झलक देख जोर से खिलखिला उठती। मामीजी भी उस हंसी में हमारे साथ शामिल हो […]

by May 2, 2017 Fursat ke Pal
स्वागतम

स्वागतम

2 साल पहले, आज ही के दिन, आये भूकम्प के बाद लिखा था ये पन्ना… सुबह साढ़े पांच बजे नींद खुल गई। कानों में पंछियों की चहचहाट रस घोल रही थी। पर्दा खींच कर एक तरफ हटाया तो ठंडी सी हवा भी तन को छूने लगी। उचक कर दरवाजे के […]

by April 26, 2017 Fursat ke Pal, Kuch Panne
बतिया

बतिया

कल रात आंगन में चहलकदमी करते, अचानक नज़र उस चांद से जा मिली.. नन्हे टिमटिमाते तारों के बीचोंबीच, चमकता दमकता सहज सलोना… पर जाने क्यों किसी कशमकश में लग रहा था… यहां वहां, गर्दन घुमाता, खुद से ही बतियाता… पल दो पल उसे देख मुस्कायी, फिर अचानक मुझे अमावस याद […]

by April 10, 2017 Fursat ke Pal
अंबर

अंबर

थकी हारी, दिन भर की ऊहापोह से जूझती, उनींदी अँखियाँ, पल भर ताकती हैं आसमां…. मेघ विहीन अंबर, दम साधे… चन्द्रमा की प्रतीक्षा में, स्वयं को तारों से सुसज्जित किये बैठा है.. पांच-सात नहीं, अनगिनत… प्रथम दृष्टा, कम दिखते हैं… पर एक बार टकटकी बंधे, तो जाने कहाँ से कितने […]

by March 14, 2017 Fursat ke Pal
भारतीय

भारतीय

रजाई में बैठी मैं अपने पाँव ठंडे होने से परेशान हो रही थी। दिल्ली में आखिर सर्दी ने ज़ोर पकड़ ही लिया, इस बात की ख़ुशी और शिकायत दोनों ही मैं अमूमन कुछ ज़्यादा करती हूँ। आखिर मौसम का बदलाव इस कवि मन को भाता जो है और व्यायाम से […]

by January 26, 2017 Fursat ke Pal
मन भर जी लेना

मन भर जी लेना

मन भर रो लेने के बाद हँसना बेहद आसान है..आप इंतज़ार करते हैं उस पल का जब कोहरे में पहली किरण चमके और आप ऊर्जा से भर जायें… कली गुलाब में आये और खिल आप जाएँ.. मेंढकों की टर्र टर्र, भँवरों की गुंजन में संगीत उनका हो, पर गुनगुनाहट आपके […]

by January 15, 2017 Fursat ke Pal
निर्मल वर्मा और लेखन

निर्मल वर्मा और लेखन

मैं उन्हें पढ़ने से बचती रही.. गाहे-बगाहे दोस्त उनका लिखा पढ़ते, सराहते… इस तरह मुझसे उनका आंशिक परिचय हो जाया करता… बेहद सरल शब्दों में सहजता से वे जो कुछ भी कहते, मैं अवाक हो पढ़ती कि यही तो, बस यही तो, मुझे भी कहना था… कैसे मेरे मन की […]

by January 14, 2017 Fursat ke Pal
कोहरा

कोहरा

सुबह के आठ बजे कंपकंपाते हाथों से दरवाज़ा खोला ही था कि सामने नजर आई कोहरे की झीनी सी चादर। धुंधला, स्याह, दमघोंटू धुआं नहीं, झक्क सफेद मखमली-सा अहसास, ज्यों वो रूई से बादल आसमां से चोरीछिपे तारकोल की सड़क पर खेलने चले आए हों। थक गए हों शायद उडते-उडते, […]

by January 14, 2017 Fursat ke Pal