Articles by: Anupama Sarkar

मित्रो मरजानी, कृष्णा सोबती

मित्रो मरजानी, कृष्णा सोबती

मित्रो मरजानी: एकदम अलग सा नाम.. ऐसा कुछ किंडल पर झलके, तो अनदेखा कर आगे बढ़ पाना मुश्किल हो जाता है.. तिस पर कृष्णा सोबती जी लेखिका हों तो जिज्ञासा और बढ़ जाती है.. सो झट डाउनलोड की मित्रो मरजानी और पढ़ने बैठ गई… किताब ज़्यादा लंबी नहीं है, दो […]

by May 4, 2018 e-Books, Review
जंगल बैबलर्स

जंगल बैबलर्स

“दो कानों में एक सर कर देना है तेरा” वो आंखें दिखाकर कहतीं और मैं फ्राक का सिरा मुंह में डाल चुपचाप बैठ जाती, टुकुर टुकुर दीदी को देखती और उनके होंठों पर मुस्कान की झलक देख जोर से खिलखिला उठती। मामीजी भी उस हंसी में हमारे साथ शामिल हो […]

by May 2, 2018 Fursat ke Pal
The Curious Case of Benjamin Button Movie

The Curious Case of Benjamin Button Movie

Clockwise या anticlockwise? घड़ी की सुइयों से दिशा निर्धारण करना कितना सरल लगता है न! पर क्या हो अगर कोई घड़ी उल्टी चल पड़े, क्या ज़िन्दगी भी उसके संग उलट जाएगी? क्या हो अगर आप बूढ़े पैदा हों, और प्रकृति को धत्ता बताते, धीरे धीरे जवान होते हुए बच्चे बन […]

by April 30, 2018 Review
My poems on YQ

My poems on YQ

by April 29, 2018 Poetry
My Poem in Defender April 2018

My Poem in Defender April 2018

My Hindi poem published in Defender Magazine April 2018 issue

by April 19, 2018 My Published Work
Mukti Bhawan Movie

Mukti Bhawan Movie

“मुझे अजीब सपने आते हैं, यकीनन मेरा अंत समय नज़दीक आ गया है, मैं कल बनारस चला जाऊँगा, मोक्ष तो वहीं मिलेगा” ये कहकर, रिटायर्ड टीचर/लेखक/कवि दया कुमार (ललित बहल), अपने जन्मदिन पर केक काट कर और गौ दान करके, मुक्ति भवन जाने की ज़िद पकड़ लेते हैं… बेटे राजीव […]

by April 17, 2018 Review
इंसानियत

इंसानियत

अखबार नहीं पढ़ती अब पोर जलते हैं मेरे समाचार नहीं देखती मन हुलसता है पर चली आती हैं गर्म हवाएं दिल जलाती, आत्मा कचोटती पक्ष प्रतिपक्ष निर्धारित करती इंसानियत अपने ही पांव पर कुल्हाडा मार दूसरों के ज़ख्म पर नमक मलती चुप हो गई हूं, नहीं जानती मैं गलत हूं […]

by April 14, 2018 Hindi Poetry
देह

देह

प्रकृति बन पौरुष सहर्ष स्वीकारती तुम सभ्यता के उत्थान में योगदान देती तुम स्वयं से पहले, परिवार, समाज को पूजती तुम सदियों से बर्बरता झेल, कोमल ह्रदय सहेजती तुम कुछ न समझा तुमने जानते बूझते आंखें मूंदे रही तुम्हें आभास भी न हुआ हर जगह, हर समय तुम केवल देह […]

by April 12, 2018 Hindi Poetry