Hindi Poetry

A Poem inspired by a Novel

Inspiration strikes me in strangest of places. I have just finished an emotionally rocking novel “Out of the Dark” written by Linda Caine and Robin Royston.

IMG_20140901_134454 Though written as a gripping suspense book, it is autobiography of a strong woman Linda Caine, who suffers through severe bouts of depression and suicidal tendencies and finally is able to unravel her dark secrets and accept her life.

The story has jolted me and I would never ever be able to do justice to it as a reviewer, so not even attempting to do that. But, the way, Robin Royston, the psychiatrist handles Linda and motivates her with fairy tales and Jungian fables, left me super impresssed, particularly one story involving a Silver Statue and Sandalwood Doll inspired me a lot and I ended up writing this poem.

चांदी का पुतला था एक, जादुई घड़ी से बंधा
हाथ में हथौड़ा लिए, हर घंटे एक चोट करता
एक बजे एक बार, दो बजे दो बार
बारह बजते ही बारह बार घंटा बजाता
फिर नियमित क्रम में एक से शुरु हो जाता।

यूं ही बीतते चले घंटे, दिन, बरसों
पर इक रोज़ जाने क्या सूझा
बारह बजते-बजते खुद को रोक न पाया
इक चोट और कर बैठा
तेरह बजते ही हथौड़ा चूर-चूर हो गया
पुतला हुआ आज़ाद, हाथ पांव चलने लगे
घड़ी की परिधि से बाहर निकलने लगे।

वहीं थी सामने जादुई खिलौनों की दुकान
उसमें बेतरतीबी से पड़ी चंदन की गुड़िया नादान
सुनती वो रोज़ घड़ी की टिक-टिक हथौड़े की टंकार
घंटों की नीरस परिधियों में बैठी चुपचाप

पर आज कुछ अलग हुआ था
बारह नहीं तेरह का आगमन हुआ था
रोक न सकी खुद को, बारहा निकल पड़ी
जानने नई बात, अब वो भी थी आज़ाद
दुकान की उमस भरी दहलीजों के पार।

पुतले और गुड़िया के लिए आज़ादी अनजानी थी
अब तक चुपचाप बीतती रही ज़िंदगानी थी
कुछ घबराए से पहुंचे दोनों जादूगर के पास
स्वीकारी अपनी गलती, जाने क्यों तोड़ दी परिधि

जादूगर उन्हें देख मुस्काया
पूर्ण मुक्ति का उपाय सुझाया
दूर बहती है एक चांद सी झिलमिलाती नदी
उसमें डुबकी लगाते ही, जान आ जाएगी तुममें पूरी।

बरबस चल पड़े पुतला और गुड़िया
नई मंज़िल की ओर, पार किए जंगल कई
ऊबड़खाबड़ राहों पर डगमगाए भी
पर बढ़ते रहे, ज्यों खींच रही हो कोई जादुई डोर।

सहसा जंगल के बीचोंबीच आग लगी
चंदन की गुड़िया डर गई
धू-धू कर जल जाएगी वो, गर चिंगारी उसे छू भर गई
पर चांदी का पुतला उसके साथ था
गोद में उठा छुपता छुपाता भागता चला गया।

सहसा कदम ठिठके, सामने थी मंज़िल
बस इक गोता लगाना था दोनों को इंसां बन जाना था
पर अब पुतला डरने लगा
क्या होगा गर जादूगर ने झूठ कहा हो
वो तो भारी है, डूब जाएगा
पानी के धरातल में कहीं गहरे समा जाएगा।

इस बार गुड़िया मुस्काई, बोली हो भी ये झूठी बात तो
क्या हो जाएगा, मैं लकड़ी हूँ, वही तो रह जाऊंगी
कहीं हल्की हूँ पानी से, तुम्हें उबार लाऊंगी
पर ये मौका न मिलेगा दुबारा
किस्मत पर भरोसा तो करना ही होगा।

दोनों ने कदम बढ़ाया
नदी में गोता लगाया, नया रूप पाया
अब वे न थे निर्जीव, हाड़ मांस के इंसां थे
चुनने को स्वतंत्र अपनी राह।

बालपन की इस कहानी ने झकझोर डाला मुझे
क्या वाकई बचपन की सीख
बड़े होकर बदल जाती है?
या फिर सीमित परिधियां हमारी खुद की बपौती हैं?
क्या कैद हैं हम इस घेरे में क्योंकि सिर्फ
दुनियादारी के उसूल निभा रहे हैं?
क्या मन की बात दरकिनार कर खुद को
खुद से ही छिपा रहे हैं?
क्या सचमुच वो ऊपर बैठा जादूगर अपनी छड़ी
हममें ही कहीं छुपाए बैठा है?
और हमारी बेबस दकियानूसी पर मुस्कुरा रहा है?
सवाल ही सवाल हैं अब तक, जवाब तो खो गए सारे!

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