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अप्रैल की शाम

अप्रैल की शाम

हल्का नीला आसमां रूई की पहाड़ियों से नन्हे नाज़ुक बादल मद्धम सी हवा और पीपल के पीछे से झांकता कुतरा सा चांद उफ्फ! अप्रैल की ये शाम कितनी प्यारी है शायद मेंह बरसने की तैयारी है!! Anupama

by April 28, 2017 Hindi Poetry
स्वागतम

स्वागतम

2 साल पहले, आज ही के दिन, आये भूकम्प के बाद लिखा था ये पन्ना… सुबह साढ़े पांच बजे नींद खुल गई। कानों में पंछियों की चहचहाट रस घोल रही थी। पर्दा खींच कर एक तरफ हटाया तो ठंडी सी हवा भी तन को छूने लगी। उचक कर दरवाजे के […]

by April 26, 2017 Fursat ke Pal, Kuch Panne
प्यार करो

प्यार करो

इतना ही तो चाहा मैंने कि तुम मुझको याद करो जब तुम देखो अपनी सूरत मुझको ही तुम याद करो जब उगता हो आधा सूरज मुझको ही तुम याद करो जब छाए वो चटख चांदनी मुझको ही तुम याद करो जब गहराए मस्या काली मुझको ही तुम याद करो जब-जब […]

by April 24, 2017 Hindi Poetry
अमलतास

अमलतास

आज देखा अजब नज़ारा गुलमोहर भी किसी से हारा! हुआ कुछ यूं कि हम चल रहे थे दीवार के साथ साथ वही निर्जीव लाल दीवार जो अपने पीछे जाने कितनी सुंदरता छुपाए बैठी है! पर आज उसकी शान ही कुछ अलग थी अमलतास के फूलों से जो ढकी थी कोमल […]

by April 20, 2017 Hindi Poetry, My Published Work
रब तेरा शुक्राना

रब तेरा शुक्राना

“पटना के सरदार गुरमीत सिंह कपड़ों की अपनी पुश्तैनी दुकान संभालते हैं।लेकिन रात होते ही वे 90 साल पुराने और 1760 बेड वाले सरकारी पटना मेडिकल कॉलेज और हॉस्पीटल के मरीज़ों के लिए मसीहा बन जाते हैं। बीते 20 साल से गुरमीत सिंह हर रात लावारिस मरीज़ों को देखने के […]

by April 19, 2017 Articles
लड़ियां

लड़ियां

लाल पीले फूलों की लड़ियां दीवारों पे लटकती पुरानी जर्जर इमारतें भी नए रंगों में चहकती। जिन बेजान पत्थरों में अपनी याद भी बाकी नहीं पुष्पों के संपर्क से सजीव हो चले ज्यों पैदा ही हुए हों महकने के लिए। बसंत क्या आई रूप ही बदल गया दीवारें बोल उठीं […]

by April 19, 2017 Hindi Poetry
सुमन

सुमन

अभेद्य प्रपंच है जीवन.. बेहद धीमी गति से रेंगता एक दुःस्वप्न.. वो हुलसकर बाहर आना चाहती है.. पर सघन तिमिर उसकी बांह खींच, वापिस ले जाता है… छोटे छोटे जुगनू, आशा की किरण से टिमटिमाते हैं और वो फिर फिर उन्हीं राहों पर लौट आती है.. चांदनी का ललचाता भ्रम […]

by April 15, 2017 Fiction
अर्पण

अर्पण

तेरा तुझको अर्पण करके भी मैं परेशान ऐसा तो हो नहीं सकता। शायद मेरे समर्पण में ही कोई कमी है। इसे पूर्ण करने की एक कोशिश और करूँ या छोड़ दूं इसे बीच राह में असमंजस तू ही सुलझा। चल एक बात तो मानी मेरे दुस्वप्न सच होते हैं। स्वप्नों […]

by April 15, 2017 Hindi Poetry