फुर्सत के पल : 5

फुर्सत के पल : 5

शर्मीला सूरज गुलाबी चमक लिए जागा है आज। चन्दा ने चादर तानकर सोने का फैसला लिया है। आज उसकी धवल चांदनी नहीं, सूरज की लालिमा ही सबके मन में छाई है। बादलोँ ने सुबह सवेरे हल्का सा गरज बरस कर शुभ मंगल सर्वदा की हुंकार लगा दी है। सेमल की […]

by February 7, 2016 Articles

A Tear and A Smile by Khalil Gibran

खलील जिब्रान की कविता A Tear and A Smile का हिंदी भावानुवाद : अनुपमा सरकार के द्वारा नहीं करूंगा आदान-प्रदान अपने हृदय के दुखों का सामूहिक सुखों से नहीं परिवर्तित होने दूंगा अपने प्रत्यंग से बहती उदासी से उपजे आंसुओं को अट्टाहस में मैं चाहता हूँ मेरे जीवन में शेष […]

by February 3, 2016 Translations
फुर्सत के पल : 4

फुर्सत के पल : 4

आज घर लौटते हुए जब पार्क से गुज़री तो खासी भीड़ थी वहां। दिल्ली का मौसम अंगड़ाइयां ले रहा है आजकल, सर्द हवाएं लुक्काछिपी खेल रही हैं और हम दिल्लीवासी, ठण्ड में ठिठुरने को आतुर भी हैं और भीषण सर्दी के न आने से खुश भी। आखिर, अति हर बात […]

by February 2, 2016 Articles
फुर्सत के पल : 3

फुर्सत के पल : 3

One for Sorrow, Two for Joy…. बचपन में मैनों के जोड़ों को देखकर अक्सर चिल्लाते थे हम, मानो, सच में दो मैना साथ देखकर ख़ुशी ने अचानक से धावा बोल दिया हो। जब दफ़्तर जाने लगी तो पूसा का हरा भरा इलाका मेरे नियमित रुट का हिस्सा हो गया और […]

by February 2, 2016 Articles
फुर्सत के पल : 2

फुर्सत के पल : 2

तेज़ी से उठता मिट्टी का ग़ुबार, कई कुत्तों के एक साथ भौंकने की आवाज़, मिमियाती बकरियां, पत्थर फेंकते बच्चे और तमाशा देखते बूढ़े और जवान। आज ये दृश्य मेरी नज़रों के सामने पड़ोस की झोंपड़ पट्टी से सटी छोटी सी पार्क में घटित हुआ। हुआ कुछ यूँ कि दफ्तर से […]

by January 28, 2016 Articles
फुर्सत के पल

फुर्सत के पल

जब भी पैदल चलती हूँ, ये नज़र पेड़ों, लोगों, पत्थरों, इमारतों, जानवर, पंछी, चबूतरों, दीवारों में उलझने लगती है। जो मज़ा धीमी गति से टहलते हुए, आसपास के नज़ारों को महसूस करने में है, वो किसी तेज़ भागती बस, ट्रेन या गाड़ी में बैठे हुए कहाँ। हालाँकि थोड़ी सी आलसी […]

by January 27, 2016 Articles
एक प्याली चाय

एक प्याली चाय

उबासी लेता चाँद बदलियों से गप्पें लड़ा रहा था पूस की रात लम्बी थी और सूरज की तबीयत कुछ बहकी सी आज सितारों की महफ़िल देर तक चलने वाली थी जवां सर्द हवाएं कानाफूसी कर रहीं थीं निशाने पर थी अलाव सेंकते उस जोड़े के कंपकंपाते हाथों में दिलकश अदाएं […]

by January 24, 2016 Hindi Poetry
गुलाबी सुबह

गुलाबी सुबह

उस ऊंची पहाड़ी की चोटी पर बाहें फैलाए खड़ी हूँ। तेज़ हवाओं से मेरे कदम लड़खड़ा रहे हैं। खुले बाल चेहरे से आंखमिचौली खेल रहे हैं। दुपट्टा गले में उलझ, किसी परिंदे सा आज़ाद होने को फ़ड़फ़ड़ा रहा है। दूर कहीं बन्दरों का कोई झुण्ड आपस की नोंक झोंक में […]

by January 20, 2016 Fiction