थम जा रे मन

थम जा रे मन

Defender मैगज़ीन में प्रकाशित मेरी कविता : बिजली की रफ्तार से भाग रहा है ये मन पंगडंडियों पर नंगे पांव सरपट दौड़ता। उस ऊंचे शिखर की ओर जहां सुबह सवेरे गोल मटोल सूरज आसमां की गोद से प्रकट होता है आंखों को ठंडक देती लालिमा का स्वर्णिम दृश्य उकेरता है। […]

by July 18, 2014 Hindi Poetry

थक गए बादल भी

थक गए शायद बादल भी उड़ते उड़ते पिघल पिघल धरती पर आ रहे हैं पानी के झीने से परदे की ओट में शर्म से अपना मुंह छुपा रहे हैं। धरा तो है ही स्नेहिल प्रेम भरी नटखट बुलबुलियों को अंक में भर नयी सरगम गा रही है और प्रकृति की […]

by July 13, 2014 Hindi Poetry
पागल चिड़िया

पागल चिड़िया

हल्का नीला आसमां तेज़ी से बढ़ती सुफेद स्याह बदलियाँ कबूतरों की उड़ती पंक्तियाँ पतंगों की उलझती डोरियाँ वेग से झपटती चीलें चलीं छूने ऊंचाईयाँ। शायद बारिश आने वाली है खंभे पर बैठी वो पागल चिड़िया पंख फुला चोंच कटकटा यही चिल्ला रही है या उसे किसी की याद सता रही […]

by July 6, 2014 Hindi Poetry
नारी जीवन

नारी जीवन

भोजपुरी पंचायत में छपा मेरा पहला आलेख नारी जीवन : एक नया आयाम कभी ध्यान से देखी है आपने वो छोटी सी नदी, जो पहाड़ों का सीना फाड़, वेग से निकलती है। चंचल, असीमित, रोमांच से भरपूर मानो पूरी दुनिया को अपने नन्हें कदमों से नाप लेगी। बिल्कुल एक नादान […]

by June 30, 2014 Events

भीगा

भीगा भीगा सा दिन, भागा भागा सा मन ढका ढका आसमां, चले महकी पवन! वो दौड़ा गिल्लू, दिल करे छू लूँ छुपी छुपी मैना, तरसे मेरे नैना भीगा भीगा सा दिन, भागा भागा सा मन! छाए काले मेघा, बिखरे स्वर्णिम छटा छिपा सूरज उनमें, बरसे ये घटा उड़े उड़े बादल, […]

by June 26, 2014 Hindi Poetry
फूलों का पुल

फूलों का पुल

अमलतास के पीलों से जकरंदे के नीलों तक एक पुल बनाना चाहती हूँ गुलमोहर के आगों से सेमल के लालों का रिश्ता साधना चाहती हूँ। गूंथना चाहती हूँ इनकी चोटियां देखना चाहती हूँ इनकी यारियां। सोचो न, यूं ही किसी रोज़ सेमल के फूलों को गुलमोहर के पत्तों का साथ […]

by June 24, 2014 Hindi Poetry

कहानी

कहानियाँ, फलसफे, अफसाने…बचपन से ही चाव से पढ़ती रही। कुछ गुदगुदातीं, कुछ सोचने पर मज़बूर कर जातीं कि आखिर कल्पना के कौन से अथाह सागर से निकलती हैं ये या सच में असलियत ही होती हैं, बस, भाषा का तड़का लगता है। पर खुद कलम उठाई तो लगने लगा कि […]

by June 22, 2014 Articles

सृजन

मत रोको विचारों के प्रवाह को, शब्दों की धार को, नदी के बहाव को। रूकते ही आक्रामक हो जाते हैं। सब बंधन तोड़ रिसावों से बहने लगते हैं। कुरेदने लगते हैं धरातल, खोखला हो जाता है रसातल और टूटने लगती हैं वो दीवारें, वो अवरोध जो बीच आ खड़े हुए। […]

by June 19, 2014 Articles