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अब नहीं

अब नहीं

अब नहीं कुरेदती मैं मन को.. आहत होना.. ज़ख्मों का रिसना.. आंसुओं का उमड़ना.. किसी छोटी सी बात पर भावुक हो जाना… झट दिल का बोझ हल्का करने को मुस्कुरा देना… हाथ बढ़ा कर कहना कि सखी संग हूँ मैं तुम्हारे.. दो चार शब्दों में उसकी व्यथा सुन लेना.. दो […]

by July 22, 2016 Fursat ke Pal
एक और गज़ल

एक और गज़ल

चूड़ियों की खनक हुई बावरी चांदनी रातें बेसबब नहीं आतीं गुनगुना रही अलमस्त हवा काली घटाएं बाज़ नहीं आतीं जादू सा घुला है फिज़ा में खामोश सदाएं शोर नहीं मचातीं समेट ले, नशीली सौगातें ‘अनु’ फलक से सितारियां रोज़ नहीं आतीं !! Anupama

by July 22, 2016 Hindi Poetry
हवा थमी सी है

हवा थमी सी है

हवा थमी सी है पंछी चुपचाप शाखों पर बैठे हैं सूरज बादलों को छिटक अपने तेज पर है और माहौल में हल्की सी गर्मी साधारण सा ही है ये दिन पर जाने क्यों मन चाहता है इक तूफ़ान सा आए फूलों में हरकत हो सड़क चलती नज़र आए गुलमोहर की […]

by July 22, 2016 Hindi Poetry
खाके

खाके

जानते हो ये दुनिया अब अच्छी नहीं लगती मुझे.. अकेली हो गई हूँ.. थी तो पहले भी पर तब महसूस नहीं होता था… दबा दीं थी भावनाएं.. उन पर मुट्ठियाँ भर भर मिट्टी डाली थी… दफन कर दिया था जज़्बातों को.. ख़्वाबों का गला घोटकर संकरी शीशी में कैद कर […]

by July 17, 2016 Fiction
मेट्रो स्टेशन तक

मेट्रो स्टेशन तक

कीचड़ में सने पाँव भी कभी कभी महंगे परफ्यूम से कहीं ज़्यादा सुख देते हैं… जब मन मौसम छटपटा कर भीग जाना चाहे तो उमस की भभकती आग भी सुहानी लगने लगती है…एक उम्मीद साथ लाती है न … भीग जाने की…. इंतज़ार जब हद से गुज़र जाये तो वस्ल […]

by July 17, 2016 Fiction, Fursat ke Pal
गुण

गुण

पहली किलकारी जब गूंजी बुने गए, गुने गए, चुने गए स्वेटर, सपने, गुण आखिरी चींख जब निकली बुने गए, गुने गए, चुने गए कफ़न, गुण, फूल आने और जाने में फर्क़ गुणों का ही है !! anupama

by July 15, 2016 Hindi Poetry
गुब्बारा

गुब्बारा

आज किसी ने जीवन मृत्यु का रहस्य समझाया मुझे.. कहने लगा.. हमें उम्र नहीं सांसें मिलीं हैं जीने के लिए.. उम्र के मानक तो हमारे अपने बनाये हैं.. दिनों, महीनों, वर्षों में बंटे.. जाली.. दरअसल तो सिर्फ सांसें मिलीं हैं.. इन्हें उच्छ्वास में ज़ाया न करो.. न किसी से नाराज़ […]

by July 15, 2016 Fursat ke Pal
आसमां

आसमां

एक और सुबह.. थोड़ी धूपीली… थोड़ी भीगी… सूरज बादलों से नाराज़ है.. ताकाझांकी करती चटकीली किरणें पिघला देना चाहती हैं रुई के खारे टुकड़ों को… नमक छूटकर गिरे धरती पर… दरारें पट जाएं… जा जमे उस दीवार पर… जो बदरंग हो चली है… पार्क की रेलिंग अपने काले रंग पर […]

by July 15, 2016 Fursat ke Pal