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मुलाक़ात

मुलाक़ात

रातरानी की कलियों और गुलाब की पंखुरियों के बीचोंबीच, चहलकदमी करते, मेरी मुलाक़ात अक्सर खुद से हो जाती है.. वो मैं, जो दिन भर फाइलों के ढेर, कागज़ के टुकड़ों, कंप्यूटर स्क्रीन पर दौड़ते भागते शब्दों के पीछे, कहीं छुपी रहती हूँ.. दम लेने को उठती हूँ, सहकर्मियों से बतियाती […]

by December 9, 2016 Fursat ke Pal
शायर

शायर

पसीना बहा सफेद पन्नों पर नज़्में नहीं लिखी जातीं न किसी की खिल्ली उड़ा गज़लों में जान आती है जज़्ब करने पड़ते हैं आंसू खून जलाया जाता है नासूर से गलती हड्डियों से टपकता मवाद खूबसूरत परतों में सहेज लफ्ज़ों में सजाया जाता है तब उभरती है कागज़ की ज़मीन […]

by December 2, 2016 Hindi Poetry, My Published Work
बुनाई

बुनाई

कविताएँ मन के हथकरघे पर हौले-हौले आकार लेतीं हैं.. ज़मीन का सौंधापन, दिल की धड़कन, अहसासों के रंग साथ लिए आतीं हैं.. निपुण बुनकर अपनी उँगलियों पर थिरकते शब्दों को ताने-बाने में उलझाता नहीं… न ही वर्तनी को लंगड़ी कर अर्थ का अनर्थ करवाता है… उसे नहीं चाहिए क्षणिक उत्तेजना, […]

by November 30, 2016 Fursat ke Pal
छटपटाहट

छटपटाहट

अजब छटपटाहट है मन में पंख फड़फड़ाते हैं उड़ते नहीं कदम लड़खड़ाते हैं संभलते नहीं दम घुटता है सिसकियां थमतीं नहीं भरसक कोशिश के बावज़ूद बेचैन हूँ 10 बाय 10 के कमरे में 2 बाय 2 के रोशनदान से छँटकर आती किरणों को महसूस करती हूँ भागकर दरवाज़े तक जा […]

by November 29, 2016 Hindi Poetry
जिये जा

जिये जा

तनावग्रस्त माहौल में हल्की फुल्की बातें अक्सर मर्म छू जातीं हैं.. आज कुछ ऐसा ही हुआ.. जहां एक और दफ्तर में ज़्यादातर लोग पैसे की किल्लत को लेकर परेशान थे, सरकार के फैसले और जनता की दिक्कतों का पुलिंदा खोला बन्द किया जा रहा था, वहीं एक सज्जन अपनी ठेठ […]

by November 28, 2016 Fursat ke Pal
लाली

लाली

मैंने कहा सूरज गुलाबी, तुमने कहा नहीं सुनहला मैंने कहा झील पीली, तुमने कहा, न न, नीली मैंने कहा चाँद हरा, तुमने कहा, नहीं रे लाली!! मैंने आँखें तरेरी, होंठ दबा कर कहा, हवा रंगीली, इस बार तुम चुप थे… झोंकों में मेरा अक़्स ढूंढते… Anupama

by November 28, 2016 Hindi Poetry
स्मृति

स्मृति

अनमोल यादों का मोल क्या चुकाया जा सकता है…..बेमोल मिल जाएं तो ही सहेजी जा सकती हैं स्मृतियां ….वर्तमान के तराजू में गुज़रे कल के चिन्ह और आने वाले कल के मीठे पलों को अक्सर होड़ लगाये देखा है…..जीत-हार के लिए नहीं…. इस मन पर एकाधिकार जमाने को……पर भूतकाल भारी […]

by November 28, 2016 Fursat ke Pal
सुकूँ

सुकूँ

शब्दों को उलट कर देखा बातों को पलट कर देखा सुकूँ न था न मिला हंसी के फव्वारे देखे जन्नत के नज़ारे देखे न न सुकूँ न मिला फूलों की ज़मीं पर तारों को बिछाकर देखा सूरज की कशिश में मन को पिघलाकर देखा फिर भी… न न न… यकायक […]

by November 28, 2016 Hindi Poetry